🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
.
*जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि ।*
*तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥८७॥*
यदि विषय की प्रबलता के कारण ब्रह्म में लीन हुआ मन विषयों की ओर दौड़े तो फिर अभ्यास द्वारा उसको पुनः ब्रह्म में ही लीन करे । इस प्रकार बराबर अध्यास करने वाले का मन स्थिर हो जाता है । इसी भाव से गीता में भी लिखा है-
“हे महाभुजाओं वाले अर्जुन ! निश्चय ही मन का रोकना कठिन है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य इन दोनों साधनों से मन को रोका जा सकता है । *चंचल और रोका हुआ मन जहाँ-जहाँ दौड़ता है वहाँ वहाँ से हटाकर पुनः आत्मा में ही स्थिर करना चाहिये* ॥८७॥”
.
*दादू मनहीं सौं मल उपजै, मन हीं सौं मल धोइ ।*
*सीख चली गुरु साध की, तौ तूं निर्मल होइ ॥८८॥*
शुद्ध अशुद्ध भेद से मन दो प्रकार का होता है । कामादि संकल्पवाला मन अशुद्ध और कामसंकल्प से रहित मन शुद्ध होता है । वासना ही मल है । अतः वासनाप्रधान अशुद्ध और निर्वासन मन शुद्ध होता है । वासनावाले मन द्वारा वासना के कारण अधर्म का आचरण करने से पाप की उत्पत्ति होती है । निर्वासन मन से विहित कर्म करने से धर्म की उत्पत्ति होती है । इसलिये मन ही धर्म और अधर्म का कारण है । योगसूत्र के भाष्य में लिखा है-
यह चित्त-नदी दोनों तरफ बहती है- कल्याण की तरफ भी और पाप की तरफ भी । जो चित्त-नदी विवेक से कल्याण की तरफ झुकती हुई बहती है, वह कल्याण के लिये है । और जो अविवेक से संसार की तरफ झुकी हुई बहती है, वह पाप के लिये है । वैराग्य से विषय प्रवाह को थोड़ा मन्द किया जा सकता है और विवेकदर्शन के अभ्यास से कल्याण के स्त्रोत का उद्घाटन किया जाता है । इस प्रकार चित्त का निरोध अभ्यास और वैराग्य के अधीन है । जैसे तीव्र वेग से बहने वाले नदीवेग को बांध के द्वारा रोक कर, नालियों के द्वारा उस पानी के वेग को खेत में पहुँचा कर उसके प्रवाह को बदल देते हैं, उसी प्रकार वैराग्य के द्वारा चित्त-नदी के प्रवाह को रोककर समाधि के अभ्यास से शान्त किया जाता है । इसी अभिप्राय से महर्षि श्री दादूजी ने लिखा है- मन ही सूं मल ऊपजै इति ।
लिखा है- “शुभ अशुभ मार्ग से बहने वाली वासना-नदी को शुभ में ही पुरुषार्थ द्वारा लगाना चाहिये । अभ्यास करते करते जब शुभवासना पैदा होती है, अभ्यास का फल मिलने से अभ्यास की सफलता समझना चाहिये ।”
जैसे मिट्टी खाने वाले बालक के मन को मिट्टी खाने से हटाकर फल-भक्षण में लगाया जाता है अथवा जैसे मणि-मुक्ता आदि की तरफ जाते हुए बालक को गैंद का खिलौना देकर उसको खेल में लगा दिया जाता है । ऐसे ही चित्त को भी विपरीत विषयों से हटाकर परमात्मा में लगाया जा सकता है ॥८८॥
*दादू कच्छब अपने करि लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर ।*
*नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥८९॥*
जैसे कछुआ भय के मारे चारों तरफ फैले हुए अपने अंगों को समेट कर पीठ के नीचे दबा लेता है, उसी प्रकार कोई साधक अपनी इन्द्रियों को प्रत्याहार द्वारा स्व स्व विषयों से हटाकर अपनी आत्मा में स्थित कर देता है, तब वह साधक ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है । गीता में भी इसी अभिप्राय से लिखा है-
“कच्छप की तरह जो अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है तो उसकी बुद्धि स्थित मानी जाती है ।” श्रुति में भी लिखा है-
जो अपनी कामनाओं को कच्छप की तरह समेट लेता है और किसी से डरता नहीं, तथा किसी को डराता भी नहीं, कुछ चाहता भी नहीं, किसी से द्वेष नहीं करता, तथा प्राणिमात्र के प्रति कर्म मन व वाणी से पाप के भाव नहीं रखता; ऐसा साधक ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ।”
अतः ब्रह्मप्राप्ति के लिये इन्द्रिय संयम अत्यावश्यक है ॥८९॥
.
*मन के मतै सब कोई खेलै, गुरु मुख बिरला कोई ।*
*दादू मन की मानैं नहीं, सतगुरु का सिष सोइ ॥९०॥*
अपने अपने मन की अनुकूलता से सभी प्राणी अपनी इन्द्रियों के विषयों से खेलते हैं; किन्तु गुरु की आज्ञानुसार कोई विरला ही होगा । जो परमात्मा से खेलता हो । अतः मन को जीतकर गुरु की आज्ञा का पालन करता है वही सच्चा शिष्य है ॥९०॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें