बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

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*पहली न्यारा मन करै, पीछै सहज शरीर ।*
*दादू हंस विचार सौं, न्यारा किया नीर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ सारग्राही का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *ईश्वर* 
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सनकादिक ने ब्रह्माजी से पुछा - "प्रभो ! चित्त स्वभाव से ही गुणों में जाता है और गुण चित्त के आश्रय रहते हैं । फिर संसार से पार होकर मुक्ति चाहने वाला व्यक्ति इनको परस्पर कैसे पृथक कर सकता है ?
ब्रह्माजी इसका उत्तर न दे सके तब उनने भगवान का ध्यान किया उसी क्षण भगवान हंस के रूप में प्रकट हुए ।
ब्रह्माजी को आगे कर के सनकादिक ने पूछा -"आप कौन हैं ? 
हंस- "विप्रगण ! यदि तुम आत्म दृष्टि से पूछते हो तब तो आत्मा एक ही, तुम्हारा प्रश्न ही नहीं बनता और यदि शरीर की दृष्टि से पूछते हो तो भी सब शरीर पंचभूत रूप होने से अभिन्न है । स्वभाव नहीं है, उपाधि है । उपाधि का त्याग करके जिज्ञासु अपने आत्मस्वरूप में स्थित होकर मुक्त होता है।"
इत्यादि उपदेश देकर सनकादि का संशय हर लिया था, यह प्रसिद्ध है।
करत भंग जिज्ञासु का संशय श्री भगवान ।
हंस होय सनकादिक का क्षण में कीन्हा भान ॥५०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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