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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग ।*
*दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥४९॥*
*दादू सतगुरु ऐसा कीजिये, राम रस माता ।*
*पार उतारे पलक में, दर्शन का दाता ॥५०॥*
जो संसार से स्वयं पार हो गया हो, साथ अपनी शरण में आये शिष्यों को भवसागर से पार उतरने वाला हो, भगवद् भक्ति से दृढ कर जीव-ब्रह्म की एकता का देने वाला हो । इन सब लक्षणो से जो युक्त हो वही 'सद्गुरु' होता है ।
गुरुगीता में :: "गुरुदेव नि:सन्देह समग्र दर्शन शास्त्रों के एक एक का रहस्य को समझाने वाले होते हैं, ईश्वरस्वरूपी होते हैं । ऐसे गुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ ।
चतुर, विवेकी, आद्यात्मिक ज्ञानी, पवित्र, तथा जिसका मन निर्मल हो -ऐसे श्रेष्ठ पुरुष ही गुरुपद का अधिकारी हैं । उसमें ही गुरुपना(गुरुभाव) शोभित होता है ।
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*देवै किरका दरद का, टूटा जोडै तार ।*
*दादू सांधै सुरति को, सो गुरु पीर हमार ॥५१॥*
जो मेरे अन्तःकरण में विरहभक्ति उत्पन्न कर दे, मेरी नष्ट हुई भगवदाकर वृत्ति को फिर भगवान् में लगा दे एवं उस चित्तवृत्ति को ब्रह्म में स्थिर कर दे-ऐसा सिद्ध महात्मा ही मेरा गुरु है । यह मेरा अहोभाग्य है ॥५१॥
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*दादू घाइल ह्वै रहे, सतगुरु के मारे ।*
*दादू अंग लगाय कर, भौसागर तारे ॥५२॥*
पहले, मेरे गुरु ने वैराग्यबोधक शब्दों द्वारा मुझे उपदेश देकर मेरे मन को घायल कर दिया, फिर स्वस्वरूप ब्रह्म में अभेद निश्चय करा कर भवसागर से तार दिया । योगवासिष्ठ में लिखा है- “तुष से बन्धे हुए को ‘व्रीही’ कहते हैं और तुष से अलग हो जाने पर वही धान्य ‘तण्डुल’ कहलाता है, इसी प्रकार पाशबद्ध ‘जीव’ कहलाता है, वही जीव जब पाशमुक्त हो जाता है तो ‘सदाशिव’ कहलाता है” ॥५२॥
(क्रमशः)

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