🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ ।*
*दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥*
==================
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
.
*उनमानी का अंग ८७*
.
सब ठाहर सब कहि गये, साच वाच कवि राव ।
ऊंट न गरजै इन्द्र सम, अपना करै स्वभाव ॥१२॥
सभी स्थानों के सभी कवि-राज यथार्थ वचन कह गये हैं कि जैसे ऊंट इन्द्र के समान तो गर्जना नहीं कर सकता किन्तु अपने बल तथा स्वभाव के अनुसार गर्जता ही है, वैसे ही सब साधक अपनी शक्ति के अनुसार भगवत् प्राप्ति का साधन करते हैं ।
.
हणवंत१ डाण२ कहु कौण दे, को दे बावन बीख३ ।
पै जीव जलणि छाडै नहीं, रज्जब देखहु लीख४ ॥१३॥
कहो, हनमानजी१ के समान छलांग२ कौन लगा सकता है ? और वामन भगवान् के समान डग३ कौन भर सकता है ? किन्तु फिर भी देखो, सांसारिक प्राणियों की रीति४, जीव दूसरे की समता करने की भावना से होने वाली हृदय की जलन को नहीं छोड़ता ।
.
फलहि सु फौरी१ आवलणि, बधि बहिलाइत२ बाँस ।
तो अफल अठारह भार कुछ, निर्फल रहे न कांस ॥१४॥
यदि आमलनि कम१ फलती है और बांस बहुत२ बढ़ जाता है, तो क्या अठारह भार वनस्पति फल रहित हो जाती है ? और कांस क्या निष्फल रहता है ? अपने स्वभाव - शक्ति के अनुसार सभी फलते हैं, वैसे ही अधिक न्यूनतम की कोई बात नहीं, अपनी शक्ति के अनुसार सभी को कल्याण का साधन करना चाहिये ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित उनमानी का अंग ८७ समाप्तः ॥सा. २७६५॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें