रविवार, 13 अक्टूबर 2019

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏
*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥
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७३ - मनसा भावत्री । राजमृगाँक ताल
अवधू कामधेनु गह राखी ।
वश कीन्ही तब अमृत सरवै१, आगै चार न नाखी ॥टेक॥
पोषँताँ पहली उठ गरजै, पीछे हाथ न आवै ।
भूखी भलै दूध नित दूणां, यों या धेनु दूहावै ॥१॥
ज्यों ज्यों खीण पड़ै त्यों दूझै, मुकता२ मेल्यां मारै ।
घाटा रोक घेर घर आणैं, बांधी कारज सारै ॥२॥
सहजैं बांधी कदे न छूटै, कर्म बँधन छुट जाई ।
काटै कर्म सहज सौं बांधै, सहजैं रहे समाई ॥३॥
छिन छिन माँहिं मनोरथ पूरै, दिन दिन होइ अनँदा ।
दादू सोई देखताँ पावै, कलि अजरावर कंदा ॥४॥
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बुद्धि को पवित्र करके परमार्थ परायण करने के लिए सँयम रूप भावत्री मँत्र बता रहे हैं - हे अवधूत ! शरीर के वस्त्र त्याग कर शीतोष्ण सहन करने से ही विशेष लाभ न होगा । जो नाना कामनाओं को उत्पन्न करने वाली बुद्धि रूप कामधेनु है, उसको सँयम द्वारा पकड़ कर रक्खो अर्थात् विषय - वासनाओं में मत जाने दो । हमने इसे सँयम द्वारा अपने अधीन की है, तब ही यह ब्रह्मानन्द रूप अमृत टपकाती है१ । इसके आगे भोग वासना रूप चारा मत डालो, 
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भोग - वासना रूप भोजन देना आरँभ करते ही यह अधिक प्राप्ति की इच्छा रूप गर्जना करके उठती है और साँसारिक भोगों की ओर भाग जाती है, पीछे सहज ही सँयम रूप हाथ में नहीं आती । इसे अच्छी प्रकार भूखी अर्थात् विषय - वासनाओं से रहित रखकर ही भगवद् - विचार रूप दूध दुहना चाहिए । यह बुद्धि - धेनु इसी प्रकार दूहाती है । 
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भोग - वासना - रूप भोजन नहीं मिलने से जैसे - जैसे यह विकार रहित होकर क्षीणता को प्राप्त होती जायेगी, वैसे - वैसे ही भगवद् विचार रूप दूध अधिक देती जायेगी । यदि इसकी इच्छानुसार अधिक२ मात्रा में विषय - वासना रूप चारा इसके आगे रखते जाओगे तो यह विषयों में पटक कर मारेगी, अर्थात् परमार्थ से गिरा देगी । इसकी विषयों में जाने की पँच ज्ञानेन्द्रिय रूप घाटियों को रोक कर अर्थात् इन्द्रियों को अपने अधीन करके वैराग्य द्वारा इसे वापस घेर कर अपने अधिष्ठान चेतन रूप घर में लाना चाहिए । यह ब्रह्म - विचार खूँटे के बंधी रहती है, तब ही मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करती है । 
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सहज निर्विकार अवस्था द्वारा जब यह स्वस्वरूप में बंध जाती है तब कभी भी नहीं खुल सकती । कर्म - बन्धन कट जाता है । जो इसे सहज स्वरूप ब्रह्म के विचार में बांधता है, वह कर्मों को काट कर सहजावस्था द्वारा सहज स्वरूप ब्रह्म में ही समा जाता है । 
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सहज स्वरूप ब्रह्म में बंधी हुई यह क्षण - क्षण में प्राणी के मनोरथों को पूर्ण करती है और प्रतिदिन आनँद ही होता जाता है । इस कलयुग में भी वह साधक देखते - देखते जीवितावस्था में ही देवताओं से अतिश्रेष्ठ आनँद - कंद परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ।
(क्रमशः)

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