रविवार, 13 अक्टूबर 2019

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*दादू तृषा बिना तन प्रीति न ऊपजै,*
*सीतल निकट जल धरिया ।*
*जन्म लगै जीव पुणग न पीवै,*
*निरमल दह दिस भरिया ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *जिज्ञासा* 
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एक स्थान में किसी वैद्य के पास एक सज्जन बहुत देर तक खड़े थे । दूसरे दिन उस सज्जन ने एक बूटी के विषय में पूछा कि यह बुटी कहां मिल सकती है ? वैद्य ने कहा - गत दिन हम जिस स्थान पर खड़े रहे थे वहां यह बुटी बहुत है । उस समय तुम्हें उसे जानने की जिज्ञासा नहीं हुई यदि होती तो बता देता । देखो बिना जिज्ञासा पास खड़ी बूटी भी नहीं जान सका । इससे सूचित होता है कि जिज्ञासा बिना ज्ञान नहीं होता है ।
जिज्ञासा बिन ज्ञान नहीं, होता है सत मान।
पास खड़े भी जड़ी को, नहीं सका पहचान ॥३१९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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