शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

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*साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोष ।*
*दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *दया* 
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संयुक्तराज्य अमेरिका के एक प्रसीडेण्ट राज्य - सभा में जा रहे थे । मार्ग मे एक सूअर के बच्चे को कीचड़ में फंसा देखकर उसके दु:ख से दुखी हो अपने सुन्दर वस्त्रों के सहित ही उसको निकालने के लिये कीचड़ में धुस गये और उसे निकाल कर सुखी हुये । 
देर हो जाने से कीचड़ में भरे वस्त्रों सहित ही राजसभा में चले गये । सब समाचार ज्ञात होने पर राज्य सदस्यगण ने उनकी बड़ी प्रशंसा की ।
प्रेसीडेण्ट ने कहा - आप लोग व्यर्थ ही मेरी प्रशंसा कर रहे हैं, मैंने सूअर पर कोई दया नहीं की, उसकी दुर्दशा देख कर मेरे हृदय में जो दु:ख हुआ था, उसको दूर करने के लिये ही मैंने सूअर को निकाला था । उसके निकालते ही मेरा दु:ख दूर हो गया । इसमे मैंने अपनी ही भलाई की है, सुअर की नहीं । तब प्रशंसा करने की बात ही कौन सी है ?
पर दुख देख दयालु के, हिय में अति दुख पाया ।
सूअर निकाल कीच से, प्रेसीडेंट सुख पाय ॥१३९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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