🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*धरती मत आकाश का, चंद सूर का लेइ ।*
*दादू पानी पवन का, राम नाम कहि देइ ॥*
==================
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
.
*निष्पक्ष मध्य का अंग ८८*
.
गोर मसाण न तिनहुं को, जेरु पड़े संग्राम ।
रज्जब शोभा सब रही, सर्वस आया काम ॥२५॥
जो वीर संग्राम में पड़ कर मरते हैं उनको कब्र वा श्मशान नहीं मिलते, उनका संपूर्ण शरीर पशु पक्षियों के काम आता है । अत: उनकी संसार में शोभा रह जाती है । वैसी ही दशा योग संग्राम में उतरे हुये निष्काम संतों की होती है ।
.
रज्जब हिन्दू तुरक की, रण नाँहीं रस रीत ।
कृत काया मुख मुख चढैं, भोले ह्वैं भयभीत ॥२६॥
हिन्दू-मुसलमानों की रीति रण में नहीं होती । वीरता से मरने पर तो वीर-रस की रीति के अनुसार उनकी काया से हुआ कार्य प्रत्येक मुख पर चढता है अर्थात सभी उसका यश कथन करते हैं । ऐसा होने पर भी भोले कायर लोग तो रण से भयभीत ही होते हैं । योग संग्राम स्थित निष्पक्ष संतों का उक्त प्रकार ही यश कथन किया जाता है किन्तु फिर भी भोले लोग साधन में नहीं लगते ।
.
पहुमि१ पवन मिल एक ह्वैं, अग्नि उदक२ ता माँहिं ।
रज्जब तुरक न पाइये, हिन्दू कोई नाँहि ॥२७॥
पृथ्वी१, वायु, जल२ और अग्नि उन हिन्दू-मुसलमानों में मिलकर एक हुये रहते हैं किन्तु फिर भी पृथ्वी आदि में कोई मुसलमान नहीं मिलता और न कोई हिन्दू है, वे तो निष्पक्ष रहकर सब का हित करते रहते हैं, वैसे ही निष्पक्ष रहकर सबका हित करना चाहिये ।
.
कै१ परम तत्त्व सौं प्राण है, कै२ पंच तत्त्व के माहिं ।
रज्जब शोधे३ उभय घर, हिन्दू तुरक सु नाँहिं ॥२८॥
कितने१ ही तो परम तत्त्व ब्रह्म से प्राणियों की उत्पत्ति मानते हैं वा२ पंच तत्त्वों के भीतर से शरीर होते हैं । ब्रह्म और पंचतत्त्व रूप दोनों की उत्पत्ति के स्थानों को हमने खोज३ लिया है, उनमें हिन्दू वा मुसलमानपना कुछ भी नहीं है, वे तो निष्पक्ष हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें