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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू मुझ ही मांहीं मैं रहूँ, मैं मेरा घरबार ।*
*मुझ ही मांहीं मैं बसूं, आप कहै करतार ॥*
*दादू मैं ही मेरे आसरे, मैं मेरे आधार ।*
*मेरे तकिये मैं रहूँ, कहै सिरजनहार ॥*
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साभार ~ satsangosho.blogspot.com
अस्तित्व बस है, अकारण है। विज्ञान के पास अस्तित्व के होने का कोई उत्तर नहीं है, हो नहीं सकता उत्तर क्योंकि विराट के होने का कारण हो कैसे सकता है? जो भी है सब विराट में समाहित है, विराट के बाहर तो कुछ भी नहीं है। समाधि इसीलिये अकारण है क्योंकि समाधि क्षुद्र नहीं, विराट है।
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समाधि कार्य-कारण के नियम के बाहर है। कि इतना पुण्य करो, इतना दान दो, इतना त्याग करो; तो समाधि घटित हो जायेगी-तब समाधि गणित के भीतर आ जायेगी; विराट न रह जायेगी। इसीलिये भक्त सदैव कहते रहे हैं कि प्रसाद-रूप में घटती है। अनायास बरसती है मनुष्य पर, भेंट-रूप; प्रसाद - रूप ! फिर श्रम और प्रयास जिसे मनुष्य करता है, उसका क्या परिणाम ? यदि सांख्य समझ में आता है, तब सारा श्रम; सारे अनुष्ठान व्यर्थ हैं, तब अनुष्ठान की कोई जरूरत नहीं है।
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ये समझ लिया कि परमात्मा तो है ही, जो हम है वह मूल से जुड़ा ही हुआ है - इसलिए जोड़ने के लिए श्रम और प्रयास छोड़ देना है................... और तब .............. मिलन घट जाएगा। मिलने के प्रयास से नहीं, प्रयास छोड़ देने से; मिलने के प्रयास से दूरी बढ़ जाती है क्योंकि जिसे खोजना है; उसे खोजने की जरूरत ही नहीं है। केवल बोधपूर्ण और जागरूक होकर देखना है, वह अन्तस् में ही विराजमान है। एक क्षण के लिए भी उसने छोड़ा नहीं है। जिससे जुदाई हो नहीं सकती, उसे जुदा समझ कर और खोज-२ कर ही मनुष्य भटका हुआ है।
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मनुष्य के द्वारा किये गए अनुष्ठानों का एक ही परिणाम होता है कि मनुष्य थक जाए और उसका सारा प्रयास एक दिन इस स्थिति में आ जाए कि प्रयास कर-२ के मनुष्य ऊब जाए और उस ऊब के क्षण में मनुष्य प्रयास करना ही छोड़ दे, तत्क्षण उसे ये प्रतीति हो जाए कि मैं भी कैसा पागल था ! मनुष्य जिसे खोज रहा है, वह मनुष्य के साथ ही है; और निश्चित ही परमात्मा मनुष्य ये सत्य जाने ऐसा कोई प्रयास नहीं करता क्योंकि ऐसा प्रयास भी मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधा बन जाएगा।
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मनुष्य के मन में इतना ऊहापोह चल रहा है, मनुष्य खोज में इस तरह संलग्न है कि परमात्मा की उपस्थिति प्रति क्षण उसके साथ है; इस पर मनुष्य की दृष्टि जाती ही नहीं। परमात्मा प्रत्येक क्षण मनुष्य के साथ ही है और मनुष्य प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ! तुम कहां हो? आंखों से आंसू निकले जा रहे हैं, लेकिन विचारों का जो ऊहापोह अन्तस् में प्रत्येक क्षण जारी है, उसके कारण - जो सामने ही है - वो दिखाई नहीं पड़ रहा है।
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समाधि घटित नहीं होती, समाधि भी यदि एक घटना होती; तो फिर कार्य-कारण से घटित होती ! कार्य-कारण से घटित होती तो बाजार की वस्तु हो जाती। ध्यान दे मनुष्य ! मनुष्य का बाजारू दिमाग परमात्मा को भी बाजार में रख देता है। इतना करेंगे, तो परमात्मा मिल जाएगा; जैसे परमात्मा कोई सौदा है। पूण्य करेंगे तो परमात्मा मिल जाएगा, तथाकथित संत भी मनुष्य को ये ही समझाते हैं : परमात्मा को पाना है, तो पुण्य करो।
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जैसे परमात्मा को पाने के लिए भी मूल्य चुकाना है, जैसे बिना कुछ किये परमात्मा मिलने वाला नहीं है। इतने पुण्य करो, इतनी तपश्चर्या, इतना मन्त्र, जप-तप-तब मिलेगा। बाजार में रख दिया मनुष्य ने ! बिकने वाला बना दिया ! खरीददार खरीद लेंगे ! जिनके पास पुण्य है, वे खरीद लेंगे ! जिनके पास पुण्य नहीं है, वे वंचित रह जाएंगे ! पुण्य के सिक्के चुकाओ, तो ही मिलेगा। कैसा पागलापन है? कैसी मूढ़ता है? इतने पर भी मनुष्य स्वयं को बुद्धिमान समझता है?
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पुण्य से मिलेगा परमात्मा? पूजा से मिलेगा परमात्मा? ये तो खरीददारी हो गई। मनुष्य ने खरीदा, प्रसाद कहां और कैसे रह गया? और यदि परमात्मा कारण से मिलते हैं, तो वह कारण यदि खो जाए; तब परमात्मा भी खो जाएंगे। मनुष्य ने खूब श्रम किया, खूब स्पर्धा की और धन कमा लिया। अब मनुष्य क्या ये सोचता है कि ये धन हमेशा टिका रहेगा? नहीं, चोर इसे चुरा सकते हैं, चोर का अर्थ है जो और भी ज्यादा जीवन को दांव पर लगा सकता हो; चोर मरने-मारने पर उतारू हो जाता है, कि धन लेकर ही जाऊंगा और इसीलिये लेकर चला जाता है। जो कारण से मिला है, वह जा भी सकता है।
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परमात्मा अकारण ही मिला हुआ है, लेकिन मनुष्य का अहंकार इसे स्वीकार नहीं करता। अहंकार तर्क करता है कि अकारण मिलने का अर्थ है, जिन्होंने कुछ भी किया नहीं उन्हें भी मिल जाएगा। कितना भी समझाया जाए मनुष्य स्वीकार नहीं कर पाता। क्योकि मन स्वीकार नहीं कर पाता कि बिना किये? बिना किये तो जो सब क्षुद्र है - मकान, धन, पद, प्रतिष्ठा - ये सब भी नहीं मिलता, तो परमात्मा कैसे मिल सकेगा?
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भरोसा नहीं आता, करना तो पड़ेगा ही; कोई उपाय करना होगा, इस 'न करने' को भी करना होगा। इसीलिये मनुष्य तरह -२ के प्रयोग करता है - कर्म में अकर्म, अकर्म में कर्म-कर्म को घुमा-फिरा कर ले ही आता है। अकर्म में कर्म - इस भाँति करेंगे, लेकिन करेंगे जरूर। बिना किये कैसे मिलेगा? लेकिन सांख्य कहता है कि मिला ही हुआ है। मिलने की भाषा ही गलत है।

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