मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

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*पूजा मान बड़ाइयां, आदर मांगै मन ।*
*राम गहै, सब परिहरै, सोई साधु जन ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *वैराग्य* 
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रामदयालुजी नामक परम विरक्त एक दादूपंथी सन्त थे। वे समुदाय से तथा पहचान के लोगों से सदा दूर ही रहा करते थे । इस वर्तमान समय में भी उन्होंने पैदल चलकर ही चारों धाम की यात्रा की थी । नरेना(जयपुर) में प्रति वर्ष फाल्गुन शुक्ल पंचमी से एका-दशी तक श्री दादूजयन्ती महोत्सव मनाया जाता है ।
संत रामदयालूजी दादूजी के जन्मदिवस अष्टमी को उस मेले में श्री दादू-मन्दिर के दर्शन करने अवश्य जाते थे किन्तु शरीर को कपड़े से ढँककर तथा मुख पर कपड़ा डालकर इस प्रकार जाते थे कि उन्हें उस भीड़ में कोई भी पहचान नहीं सकता था ।
आरती के दर्शन करके शीध्र वहां से चल देते थे । इसका विशेष -विशेष व्यक्तियों को ही पता लगता था । वे प्रतिष्ठा से सदा डरते थे ।
नहीं प्रतिष्ठा चाहते, विरक्त निजी छिपात ।
छिपकर रामदयालुजी, दादूदर्श को जात॥२१२॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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