मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

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*सतगुरु काढे केस गहि, डूबत इहि संसार ।*
*दादू नाव चढाइ करि, कीये पैली पार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *क्षमा* 
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एक युवक उपदेश लेने के लिये एक संत के पास गया और उपदेश के लिये प्रार्थना की । संत ने कहा - प्रथम स्नान कर आओ । युवक स्नान करने गया ।
संत ने झाडू देती हुई भंगिन को बुलवाकर कहा - यह जो स्नान करने गया है आवे तब झाडू से उठाकर मिट्टी डाल देना । भंगनी जानती थी कि यह परीक्षा लिया करते हैं । इसलिये उसने वैसा ही किया ।
युवक को बड़ा क्रोध हुआ, वह पत्थर लेकर भंगन को मारने दौड़ा, किन्तु भंगीन सचेत थी भाग गई । फिर स्नान करके वह संत के पास गया ।
संत - अभी तो तुम पशुओं के समान दौड़ते हो, उपदेश के अधिकारी नहीं हुये । एक वर्ष नाम का जाप करके आओ । एक वर्ष के बाद फिर गया । फिर भी पूर्ववत् ही आज्ञा हुई ।
संत ने फिर भंगन से कहा - अब के जब वह स्नान करके आवे तो झाडू छुवा देना । भंगन ने वैसा ही किया । अबकी बार क्रोध तो किया किन्तु मारने को नही दौड़ा । कुछ कटु वचन कह करके पीछे ही स्नान करने चला गया ।
फिर संत के पास आया, तब संत ने कहा - अभी तो तुम भूँकते हो । एक वर्ष तक फिर जप करके आओ । युवक ने वैसा ही किया और आया तब भी पूर्ववत् ही स्नान की आज्ञा देकर संत ने भंगन से कहा - अब के कूड़े की टोकरी उसके उपर डाल देना । भंगन ने वैसा ही किया ।
अबकी बार युवक ने हाथ जोड़कर कहा - माताजी ! तुमने बड़ी कृपा की । तुम्हारी कृपा से मैं बड़प्पन के अंहकार तथा क्रोध को जीत सका हूँ तुम मेरी गुरु हो । यह कह कर तथा पुन: स्नान करके संत के पास गया संत ने भी गले लगाकर कहा - अब तुम उपदेश के अधिकारी हो गये ।
इससे सूचित होता है कि क्षमाशील हुए बिना उपदेश का अधिकारी नहीं होता । 
क्षमा बिना उपदेश का, होता नहिं अधिकारी ।
करी परीक्षा युवक की, भंगिन से त्रय बारी ॥२८५॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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