गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

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*क्षीर नीर का संत जन, न्याव नबेरैं आइ ।*
*दादू साधु हंस बिन, भेल सभेले जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ सारग्राही का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु**भाग १**पक्षपात*
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परशुरामपुरी(सलेमाबाद) के साधुओं की एक जमात पादूग्राम में आई । जमात वाले साधु संत दादूजी की निन्दा करते हुये जनता को अपनी ओर खींचने का यत्न करते थे ।
वहां अल्लहण नामक एक भक्त था जो संत दादूजी को अपना गुरु मानता था । उसे भी बारंबार अपना शिष्य बनाने का आग्रह करते थे और कहते थे कि - 'दादू का मत सच्चा नहीं है, हमारा सच्चा है ।' अल्लहण बड़े सहनशील थे कुछ भी न कह कर चुप रहते थे ।
एक दिन उन्हें बहुत दबाया तब अल्लहण ने कहा "इस सन्मुख बैठी दो मास की पाडी का जो दूध निकाल ले उसी का मत सच्चा माना जायेगा । आप लोग संत है इसलिये प्रथम आप दुह लें फिर मैं प्रयत्न करूंगा ।" साधुगण से दूध नहीं निकाल सका ।
अन्त में अल्लहण ने अपने गुरुदेव दादू का स्मरण करके पाडी के थप्पी देकर उसके छोटे-छोटे थनों से दूध निकाल दिया । तब साधुगण लज्जित हो क्षमा मांगने लगे ।अल्लहण बोला - मैं तो संतों का दास हूँ आप से मेरी कोई हानि नहीं हुई । मेरे द्वारा आपको जो विक्षेप हुआ, उसे क्षमा करें तथा संतों में भेद दृष्टि नहीं रखें ऐसी कृपा करें ।
पक्षपात की बात से, अन्त न विजय दिखात ।
अल्लहण ने पाडी दुही, लज्जित साधु जमात॥९९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ###
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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