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*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *सेवा*
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एक राजा बड़ा साधुसेवी था । इससे सदा साधुओं की भीड़ लगी रहती थी । एक परम भक्त ज्ञानी संत से राजा की बड़ी प्रीति हो गई थी । वह उन्हे जाने नहीं देता था । अन्त में संत ने दृढ निश्चय कर लिया कि अमुक दिन हम अवश्य चले जायेंगे ।
निश्चित दिन से पहले दिन राजा को व्याकुल देख कर रानी समझ गई कि संत के जाने से राजा जीवित नहीं रह सकेंगे । फिर यह सोचकर कि यदि मैं पुत्र को विष दे देती हूं तो पुत्र की मृत्यु से संत कुछ दिन और ठहर जायंगे, रात्रि को विष दे दिया ।
प्रात: राज-महल से महारुदन की ध्वनी सुनके संत भी शीध्रता से भीतर गये । बालक का शरीर देखकर के बोले - "इसे तो किसी ने विष दिया है । विशेष पूछने पर ज्ञात हुआ कि सन्तों के रोकने के लिये रानी ने दिया है ।"
यह सुनकर संकीर्तन आरम्भ किया । थोड़ी देर में बालक जीवित हो गया । फिर वे संत राजा की ऐसी प्रीति देखकर सदा के लिये वहाँ ही रह गये । इससे सूचित होता है कि साधुसेवी साधु वियोग से व्याकुल होता है ।
साधुसेवी होता विकल, सुनतहि साधु वियोग ।
सुत को विष दे रानि ने, रक्खा साधु सँयोग ॥३५३॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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