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*जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।*
*दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *सेवा*
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भक्त तिलोचन जाति के वैष्य थे । उनका साधू-सेवा में बड़ा ही अनुराग था । घर पर स्त्री-पुरुष दो ही लोग थे । उनकी इच्छा थी कि ऐसा नौकर मिले जो साधुओं की मन से जान-जान कर सप्रेम सेवा किया करे ।
भक्त की इच्छा पूर्ण करने के लिये भगवान स्वयं ही टहलवे के रूप में भक्त के घर आये । अपना नाम अन्तर्यामी बताया और भोजन मात्र नौकरी ठहरा-कर रह गये और कहा - "जिस दिन मेरे खाने की बात किसी अन्य को कही जायेगी उसी दिन मैं चला जाऊंगा ।" १३ महीने तक खूब सेवा करते रहे ।
एक दिन तिलोचन की स्त्री ने पड़ोसिन को कह दिया कि - "नौकर तो हमारा बहुत अच्छा है किन्तु खाता बहुत है ।" उसी समय अन्तर्यामी अन्तर्धान हो गये । इससे तिलोचन को बड़ा दु:ख हुआ । तीन दिन तक अन्न-जल बिना पड़े रहे ।
तब आकाशवाणी हुई के - "तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने के लिये मैं ईश्वर ही टहलवे के रूप में आया था तुम शोक छोड़कर मेरा ही भजन करो ।" इससे सूचित होता है कि साधु की सेवा ईश्वर भी करते हैं ।
साधुसेवी की करत है, सेवा ईश्वर आय ।
करी तिलोचन भक्त की, आपही घर पर जाय ॥३३७॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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