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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*दादू दीया है भला, दीया करौ सब कोइ ।*
*घर में धर्या न पाइये, जे कर दीया न होइ ॥३७॥*
ज्ञान का दीपक अतिश्रेष्ठ है । गीता में लिखा है- “ज्ञान के समान कोई दूसरा पवित्र करने वाला साधन नहीं है । इस लिये सभी को अपने हृन्मन्दिर में ज्ञानदीपक जला कर ब्रह्म-साक्षात्कार करना चाहिये । अन्यथा अपने घर में स्थित वस्तु प्रकाश के अभाव से जैसे नहीं दीखती, वैसे ही अत्यन्त समीप होने पर भी यह आत्मा नहीं दीखता, क्योंकि प्रकाश नहीं है” ॥३७॥
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*दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात ।*
*दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥३८॥*
ज्ञान दो प्रकार का होता है- १.परोक्ष और २.अपरोक्ष । जिनको अपरोक्षानुभूति हो गयी उन्होंने ज्ञानदीपक का ब्रह्मसाक्षात्काररूप फल प्राप्त कर लिया । इस ज्ञानदीपक में पराभक्ति ही मोटी बत्ती है । ज्ञान होने पर चराचर जगत् ब्रह्मरूप से दीखने लगता है और लोक-परलोक में ज्ञान ही संग चलता है । योग-वासिष्ठ में लिखा है-
हे राम ! ज्ञान से सब दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से ही अज्ञान का नाश होता है । ज्ञान से ही परासिद्धि प्राप्त होती है, अन्य किसी साधन से नहीं । ज्ञान से सकल आशाओं को नष्ट कर के सम्पूर्ण चित्तरूपी पर्वत को नष्ट करके वीतहव्य मुनीश्वर हो गये ।
विवेकी मनुष्य ज्ञान के द्वारा राग-द्वेषादि दोषों को नष्ट करके उपाधिजन्य सकल विकारों से रहित होकर परमार्थ तत्त्व को प्राप्त करके चिरकाल से अन्तःस्थित अपने अन्तर स्वरूप ब्रह्म पद को प्राप्त करके शोक से रहित हो जाता है ॥३८॥
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*सत्य गुरु*
*निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार ।*
*निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार ॥३९॥*
*निर्मल तन मन आत्मा, निर्मल मनसा सार ।*
*निर्मल प्राणी पंच कर, दादू लंघे पार ॥४०॥*
इस साखीवचन में ‘निर्मल’ शब्द का क्या अर्थ है? कहते हैं कि ज्ञान में त्रिविध वासना ही ‘मल’ शब्द से कही जाती है । पराभक्ति में फलेच्छा को ‘मल’ कहते हैं । अनिर्वचनीय प्रेमरस में सापेक्षता ही ‘मल’ है ।
योगवासिष्ठ में वासना का स्वरूप यों बतलाया है-
पूर्वापर का विचार त्यागकर दृढ़ भावना से जिस किसी वस्तु के ग्रहण करने को ही ‘वासना’ कहते हैं । शुद्ध, अशुद्ध भेद से वासना दो प्रकार की होती है । दैवी सम्पत् शुद्ध वासना है । यह शास्त्र संस्कारों के कारण तत्त्वज्ञान में साधक होने से एक ही प्रकार की है और मलिन(अशुद्ध) वासना तीन प्रकार की है-१.लोकवासना, २.शास्त्रवासना एवं ३. देहवासना ।
‘कोई भी मेरी निन्दा न करें, ऐसा आचरण मैं करूँ’-इस अशक्य अर्थ में अभिनिवेश ही लोकवासना कहलाती है । इस लोकवासना को कोई पूर्ण नहीं कर सकता तथा पुरुषार्थ में भी इसका कोई उपयोग न होने से यह लोकवासना मलिन है ।
शास्त्रवासना भी १.पठनव्यसन् २.बहुशास्त्रव्यवसन् एवं ३. अनुष्ठानव्यवसन भेद से तीन प्रकार की है । ऐसी वासना क्लेश देने वाली, पुरुषार्थचतुष्टय में अनुपयोगी एवं पुनर्जन्मप्रद होने से मलिन मानी जाती है ।
देहवासना भी १.आत्मत्वभ्रान्ति, २.गुणाधानभ्रान्ति, भी एवं ३.दोषापनयनभ्रान्ति भेद से तीन ही प्रकार की है-१.देहों में आत्मत्वभ्रान्ति तो सर्वजगत्प्रसिद्ध ही है । २. गुणाधानभ्रान्ति भी दो प्रकार की है-शास्त्रीय तथा लौकिक भेद से । अच्छे-अच्छे शब्दों को चुनकर शास्त्र निर्माण करना शास्त्रीय गुणाधानभ्रान्ति है । चिकित्सकों द्वारा बतायी हुई औषधि से समय व्याधियों का नाश करना, वैदिक स्नान आचमन आदि से स्वशरीर को पवित्र बनाना लौकिक गुणाधान भ्रान्ति है । ये सब भी मलिन है; क्योंकि मुक्ति में इन का कोई उपयोग नहीं । तथा अशक्य एवं पुनर्जन्मप्रद तथा अप्रमाणिक होने से भी ये मलिन वासना है । आभ्यन्तर वासना तो काम-क्रोध-लोभ आदि आसुरी सम्पद् रुप होने से तथा अनर्थमूलक होने से मलिन है । इस को ‘मानसी वासना’ कहते हैं ।
इन उपर्युक्त वासनाओं से जो रहित है वह निर्मल गुरु, निर्मल ज्ञान एवं निर्मल भक्ति कहलाती है । इन सभी साधनों से स्वचित्त का संशोधन कर प्राणी संसारसागर से पार हो जाता है । लिखा है कि-
जो व्यक्ति निर्मल है, शान्तचित्त है, मितभाषी एवं काम-क्रोधादि से रहित है, जितेन्द्रिय, सदाचारी एवं निर्मल मन वाला है वही ‘गुरु’ पद का वाच्यार्थ है ॥३९-४०॥
(क्रमशः)

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