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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*सब जीवों को मन ठगै, मन को बिरला कोइ ।*
*दादू गुरु के ज्ञान सौं, सांई सन्मुख होइ ॥९१॥*
यह मन विषयों की इच्छा से ज्ञान को आहत कर के विषयों में सत्यत्वबुद्धि पैदा करके विवेक का ग्रहण न होने से शुक्ति में रजत की तरह तथा मृगतृष्णिका के पानी से भ्रमित मृग की तरह जीवमात्र को भरमाता है । मन को कोई नहीं जीत पाता । ज्ञान को नष्ट करने वाले मन को गुरुज्ञान के द्वारा जीतकर जो ब्रह्म में रमण करता है वही मन को जीत सकता है । इसलिये मन को जीतने के लिये पहले इन्द्रियों पर विजय पाना आवश्यक है । लिखा है-
“इन्द्रियाँ मनुष्य के मन को मथन करने वाली हैं, विद्वान् के मन को भी हठात् हरण करके ले जाती हैं ।”
“मन जब इन्द्रियों के अधीन हो जाता है तो इन्द्रियाँ मनुष्य की बुद्धि को भी उसी प्रकार बहा ले जाती है जैसे कि पानी में नौका को हवा बहा ले जाती है । इसलिये जो सब इन्द्रियों को वश में करके भगवत्परायण रहता है उसकी बुद्धि स्थित रहती है ॥९१॥”
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*दादू एक सौं लैलीन होना, सबै सयानप येह ।*
*सतगुरु साधु कहत हैं, परम तत्त जपि लेह ॥९२॥*
सद्गुरु तथा साधुजन यही उपदेश करते हैं कि सब कुछ छोड़कर, भगवान् की ही उपासना करनी चाहिये यही सब से बड़ी चतुराई है, बाकी सब तो आत्मप्रवंचना मात्र है ॥९२॥
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*सतगुरु शब्द विवेक बिन, संयम रह्या न जाइ ।*
*दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाइ ॥९३॥*
आत्मा एवं अनात्मा का विचार ही ‘विवेक’ है । वह विवेक गुरुप्रदत्त उपदेश से ही होता है और विवेक से इन्द्रियसंयम होता है । विवेक के विना कोई भी इन्द्रियसंयम नहीं कर सकता । अतः अपने चैतन्यस्वरूप आत्म को जानकर उसी में अपने चित्त को लगाओ । जैसे सुवर्णकार भूषणों को बेचता हुआ भार तथा वर्ण में ही अपना मन लगाये रखता है; ऐसे ही चैतन्य मात्र में अपने मन को स्थिर करो, जब तक कि मन की प्रवृत्ति श्वास की तरह स्वाभाविक न हो जाय । जड़ पदार्थों में जो मन की उत्सुकता है, वह तो हालाहल विषभक्षण के समान है । योगवासिष्ठ में लिखा है-
“सम्पत्ति तथा स्त्रीसंभोग तो नदी की तरंगों की तरह क्षणभँगुर हैं, और सर्प के फण की छत्रच्छाया की तरह है । उनमें बुद्धिमान अपना चित्त नहीं लगता” ॥९३॥
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*घर घर घट कोल्हू चलै, अमी महारस जाइ ।*
*दादू गुरु के ज्ञान बिन, विषै हलाहल खाइ ॥९४॥*
मुमुक्षु पुरुष अपने को बंध से मुक्त करने की इच्छा से, जैसे तीव्रतर भूख लगने पर अन्न के विना ऐहिक एवं पारलौकिक भोग प्राप्त होने पर भी वह भूखा आदमी उनको नहीं चाहता; परन्तु उनको तृण के समान त्याग कर जरा सी भी देरी को सहन नहीं करता, अन्न को ही चाहता है । इसी प्रकार मुमुक्षु आत्मस्वरूप ब्रह्म के अतिरिक्त ऐहिक पारलौकिक भोगों को त्यागने की ही इच्छा करता है; क्योंकि वे मोक्ष में बाधक होते हैं । श्रुति में लिखा है- “भोगों के त्याग से ही अमृतत्व प्राप्त होता है ।” वार्तिकामृत में लिखा है-
“जब तक मानवमात्र विषयों से नरक की तरह निर्विण्ण नहीं होता, तब तक वह मोक्षमार्ग पर चलने का अधिकारी नहीं हो पाता ।”
जो साधक सम्पूर्ण आसक्तियों से निर्मुक्त होकर केवल मोक्ष को ही चाहता है, वही प्रत्यग्ज्ञान की उत्पत्ति में अधिकारी माना गया है, रागवान् नहीं ।
इसी अभिप्राय से श्रीदादूजी महाराज ने वैराग्य को दृढ़ करने के भाव से ही स्त्री-प्रसंग का निषेध किया है; क्योंकि स्त्री का संग वैराग्य का विरोधी है ।
“मन्द, तीव्र, तीव्रतर भेद से वैराग्य तीन प्रकार का होता है ।”
स्त्री-पुत्रादि के मरने पर ‘इस संसार को धिक्कार है’- ऐसी जो तात्कालिक बुद्धि पैदा होती है वह ‘मन्द वैराग्य’ है ।
‘इस जन्म में मुझ को कभी स्त्री-पुत्रादि में राग न हो’-ऐसी जो स्थिर बुद्धि है यह ‘तीव्र वैराग्य’ है ।
‘इस संसार में मैं कभी न जन्म लूँ- ऐसी जो तीव्रभावना है वह ‘तीव्रतरवैराग्य’ कहलाता है ।’
मन्द वैराग्य में किसी का भी त्याग नहीं । अतः घर घर घट कोल्हू चलै- इस वचन से महात्मा कहते हैं गुरु के ज्ञान विना संसारी पुरुष स्त्री प्रसंग से वीर्य जैसे महारस को व्यर्थ ही खोते हैं । अतः उनको गुरु के ज्ञान से वैराग्य प्राप्त करना चाहिये ॥९४॥
(क्रमशः)

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