मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

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*राते सेवा शंकर देव,*
*ब्रह्म कुलाल न जानै भेव ।*
*कीरति करणा चारों वेद,*
*नेति नेति न विजाणै भेद ॥*
*ऐसो राजा सोई आहि,*
*चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।*
*दादू ताकी सेवा करै,*
*जिन यहु रचिले अधर धरै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३९१)*
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साभार ~ Tapasvi Ram Gopal
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग २* *ईश्वर* 
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दिति का छोटा पुत्र हिरण्याक्ष पृथ्वी को रसातल में ले गया । सृष्टि रचना के लिये स्थान की आवश्यकता हुई । ब्रह्माजी ने भगवान का ध्यान किया । उसी समय उन्हें छींक आई । नाक से अंगुष्ठ मात्र वराह निकल कर खड़ा हो गया और क्षण मात्र में हाथी के बराबर बढ गया । फिर समुद्र में प्रवेश कर हिरण्याक्ष को मारकर पृथ्वी को लाये थे ।
ब्रह्मादिक का कष्ट भी, हरि करते है दूर ।
लाये धरा तुरन्त ही, हत हरिणयाक्ष सुक्रूर ॥३६॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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