#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= फुटकर काव्य २.गूढार्थ - १७/१८ =*
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*तरक बुराई बहुत बिधि हैरिप माया जाल ।*
*नरम होई पल एक मैं करन जाइ तत्काल ॥१७॥*
जो नाना प्रकार से निन्दा(बुराई) का त्याग करता है । माया मोह का परित्याग करता है । एक क्षण में ‘मरन’(मृत्यु) हो सकती है – ये तीन वाक्य भी तीन प्रतिलोम वर्णों को अनुलोम कर देने से बने हैं ॥१७॥
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*मरा मना भजिबौ करौ गरा षदो नहिं कोइ ।*
*ईसो धूसा जानिये हूका पैलि न सोइ ॥१८॥*
‘राम’ का ‘नाम’ भजो, इससे मन में किसी के प्रति ‘राग’, ‘द्वेष’ उत्पन्न नहीं होता । उसे ही ‘साधु’ समझना चाहिये जो विषय वासना में लिप्त नहीं होता । ये छह(६) शब्द भी प्रतिलोम अक्षरों को अनुलोम कर देने पर बने हैं ॥१८॥
(क्रमशः)

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