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*दादू रमता राम सौं, खेलैं अन्तर मांहि ।*
*उलट समाना आप में, सो सुख कतहुँ नांहि ॥*
*परगट खेलैं पीव सौं, अगम अगोचर ठांव ।*
*एक पलक का देखणा, जीवण मरण का नांव ॥*
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साभार ~ Ramesh Bhai oza "Bhaishri"
यदि ये समझ में आ जाये, तो परमात्मा को पाने के जितने उपाय हैं; ये झूठी बीमारी को समाप्त करने की औषधियां हैं। इसीलिये ये सूत्र महत्वपूर्ण है। सूत्र के अनुसार बिछुड़ना कभी हुआ नहीं, बिछुड़ सकते नहीं; इसलिए सारे उपाय व्यर्थ हैं। और जितना मनुष्य उपाय,अनुष्ठान करेगा; उतना ही भटकेगा। अनुष्ठान बंधन है - इसका ठीक-२ अर्थ है योग में मनुष्य न भटके, उपाय में मनुष्य न लगे। उपाय मनुष्य को दूर ले जाएगा। क्योंकि मनुष्य जिसे खोज रहा है, उसे कभी खोया नहीं है। परमात्मा अभी और इसी क्षण मौजूद है।
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एक सिंहनी गर्भवती थी और एक टीले से छलांग लगाते हुए झटके के कारण उसका सिंह-शावक नीचे से गुजर रहे भेंड़ों के झुण्ड में गिर पड़ा। वह सिंह शावक भेंड़ों के साथ ही बड़ा हुआ। वह भेंड़ों जैसा ही मिमियाता, उन्ही की तरह घिसट-२ कर चलता। उसने सब भेंड़ चाल सीख ली क्योंकि और कोई उपाय भी न था।
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और तो और मनुष्य का बच्चा भी होता तो वो भी ये ही करता, वो तो सिंह - शावक था। उसने भी स्वयं को भेड़ ही समझा। वह भेड़ों जैसा ही डरता और भेड़ भी सब उससे राजी हो गईं, उन्ही में बड़ा हुआ इसीलिये भेड़ों ने कोई चिंता भी नहीं ली। ऐसे ही वर्षों बीत गए, सिंह बहुत बड़ा हो गया; उसका विराट शरीर भेड़ों से बहुत बड़ा हो गया लेकिन फिर भी वह भेड़ों के झुण्ड में चलता और वैसा ही घबड़ाता। उसने कभी जाना ही नहीं कि वह सिंह है। था तो सिंह, लेकिन विस्मरण हो गया।
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फिर एक दिन ऐसा हुआ कि एक बूढ़े सिंह ने हमला किया भेड़ों के उस झुंड पर। वह बूढ़ा सिंह तो चौंक गया, वह तो विश्वास ही न कर सका कि एक जवान सिंह, सुंदर, बलशाली, भेड़ों के बीच घसर - पसर भागा जा रहा है, और भेड़ें उससे घबड़ा नहीं रहीं। और इस सिंह को देखकर सब भागे, बेतहाशा भागे, रोते - चिल्लाते भागे। इस बूढ़े सिंह को भूख लगी थी, लेकिन भूख भूल गई।
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इसे तो यह चमत्कार समझ में न आया कि यह हो क्या रहा है? ऐसा तो कभी न सुना, न आंखों देखा। न कानों सुना, न आंखों देखा; यह हुआ क्या? वह भागा। उसने भेड़ों की तो फिक्र छोड़ दी, वह सिंह को पकड़ने भागा। कठिनाई से पकड़ पाया : क्योंकि था तो वह भी सिंह; भागता तो सिंह की चाल से था, मझा अपने को भेड़ था। और यह बूढ़ा सिंह था, वह जवान सिंह था। कठिनाई से पकड़ पाया। जब पकड़ लिया, तो वह रिरियाने लगा, मिमियाने लगा। सिंह ने कहा, चुप ! एक सीमा होती है किसी बात की। यह तू कर क्या रहा है? यह तू धोखा किसको दे रहा है? वह तो घिसट कर भागने लगा। वह तो कहने लगा, क्षमा करो महाराज, मुझे जाने दो !
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लेकिन वह बूढ़ा सिंह माना नहीं, उसे घसीट कर ले गया नदी के किनारे। नदी के शांत जल में, उसने कहा जरा झांक कर देख। दोनों ने झांका। उस युवा सिंह ने देखा कि मेरा चेहरा और इस बूढ़े सिंह का चेहरा तो बिलकुल एक जैसा है। बस एक क्षण में क्रांति घट गई। *'कोई औषधि नहीं !'* हुंकार निकाल गई, गर्जना निकल गई, पहाड़ कांप गये आसपास के ! कुछ कहने की जरूरत न रही। कुछ उसे बूढ़े सिंह ने कहा भी नहीं - सदगुरु रहा होगा ! दिखा दिया, दर्शन करा दिया। जैसे ही पानी में झलक देखी - हम तो दोनों एक जैसे हैं - बात भूल गई। वह जो वर्षों तक भेड़ की धारणा थी, वह एक क्षण में टूट गई। उदघोषणा करनी न पड़ी, उदघोषणा हो गई। हुंकार निकल गई, क्रांति घट गई।
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अब तुम पूछो कि अगर कोई सिंह भेड़ों में खो गया हो, तो उसे वापस सिंह बनाने की औषधि क्या है? औषधि कोई नहीं - नो रेमेडी ! उसे कितने ही इंजेक्शन लगाओ, कितना ही वेटेनरी डाक्टर के पास ले जाओ, दवाइयां पिलवाओ - उससे कुछ लाभ न होगा। दवाइयां, इंजेक्शन, वेटेनरी डॉक्टर फिर भी कुछ हो नहीं रहा। मैं सिंह तो हो नहीं पा रहा हूं। और अगर मैं सिंह ही था, तो उपाय क्यों किये जाते? जरूर मैं भेड़ हूं जबर्दस्ती ये लोग सिंह बनाने की चेष्टा कर रहे हैं।
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फिर यदि समझा-बुझा कर किसी तरह कोई इसे ये भरोसा भी दिला दे कि रोज तू स्मरण कर सतत कि मैं सिंह हूं - ऐसा प्रतिदिन कर - अहम् ब्रह्मास्मि - धीरे २ सब हो जाएगा। ऐसा यदि ये सिंह भी वर्षों कहता रहे, और वर्षों कहने के बाद मान भी ले; तो क्या सिंह हो जाएगा? ये मान्यता ही रहेगी, ये विचार की पर्त ही रहेगी। उस बूढ़े सिंह ने ठीक ही किया, उसने कोई मन्त्र नहीं दिया; जप-तप नहीं बताया।
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एक स्थिति पैदा की, जिसमे इसे अपने स्वभाव की झलक मिल गई। सत्संग का अर्थ ही ये ही है कि किसी ऐसे मनुष्य के पास बैठना, उठना, जिसे अपने स्वरूप का बोध हो गया है; उसके साथ स्थिति संक्रामक हो जाए, उसकी उपस्थिति में मनुष्य के भीतर सोई चेतना जाग जाए। औषधि कोई भी नहीं है, उपाय कोई भी नहीं है; विधि कोई भी नहीं है। कोई औषधि नहीं है, क्योंकि ये सब दृश्य झूठ है। उस सिंह का भेंड़ होना झूठ था,ये सारा दृश्य झूठ था। माना हुआ था, इसीलिये सच प्रतीत हो रहा था। जिस क्षण जान लिया, उसी क्षण झूठ हो गया। ये स्वप्नवत् था।
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*'मैं एक अद्वैत शुद्ध चैतन्य हूं।'*
कोई विधि नहीं है इसीलिये ये सूत्र महिमावान हैं। इतना ही कहा गया है कि मनुष्य ने परमात्मा को कभी खोया नहीं है। जाग जाए मनुष्य और अपने स्वरूप को पहचाने।

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