रविवार, 13 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग ५३/५६

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
*दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ ।* 
*साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ ॥५३॥* 
जिसने स्वयं आत्म-साक्षात्कार कर लिया हो, तथा जो सत्यनिष्ठ हो वही सद्गुरु कहलाता है । ऐसे सद्गुरु ने साधक को सत्य ब्रह्म का उपदेश किया जिससे साधक अज्ञानादि दोषों से रहित हो ब्रह्मप्राप्ति से तद्रूप हो गया ॥५३॥ 
*साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध ।* 
*साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥५४॥* 
इस साखी में सच्चे गुरु सच्चे साधु एवं सच्चे स्वामी का लक्षण बता रहे हैं । जो जीव ब्रह्म का अभेद बोधन करता हो; अभेदज्ञानोपदेश से मुक्ति करता हो, भेद से नहीं; क्योंकि भेद तो दुःखदायी होता है । श्रुति में लिखा है- “द्वितीय बुद्धि से भय पैदा होता है” । अतः जो गुरु भेद को हटाकर ब्रह्म में अभेद-निष्ठा कराता है वह सद्गुरु कहलाता है । गुरुगीता में लिखा है- 
‘जो ब्रह्मानन्दस्वरूप है, परम सुख का दाता है, केवल ज्ञानमूर्ति, द्वन्दों से पृथक, एवं आकाश के समान निर्लेप है, ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का लक्ष्यभूत, एक, नित्य, निर्मल, कूटस्थ, समस्त बुद्धियों के साक्षी और भावों से अतीत एवं गुणत्रयरहित है, ऐसे सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ ॥’ 
जो साधनपरायण रहता है, तथा जैसा कहता है वैसा ही आचरण करता है वह सच्चा साधु है । इन दोनों को खोजकर इन के सत्संग द्वारा त्रिकालातीत, सर्व उपाधियों से शून्य, स्वसाक्षिस्वरूप स्वामी की उपासना से जीव ब्रह्म के भेद को त्यागकर अपनी आत्मा का विचार करते हुए ब्रह्म की भक्ति करो ॥५४॥ 
*सन्मुख सतगुरु साधु सौं, साई सौं राता ।* 
*दादू प्याला प्रेम का, महारस माता ॥५५॥* 
*सांई सौं साचा रहै, सतगुरु सौं सूरा ।* 
*साधू सौं सनमुख रहै, सो दादू पूरा ॥५६॥* 
दोनों पदों में शिष्य के लक्षण बताते हैं- जो गुरु एवं साधुओं के सदा अनुकूल आचरण करे, प्रभु प्रेम में सदा अनुरक्त रहे, ब्रह्मानन्द रस में डूबा रहे; गर्भ से बाहर आते हुए जो प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं आपको कभी नहीं भूलूँगा, सदा स्मरण करता रहूँगा’- उसका पालन करते हुए स्वयं को प्रभु के सम्मुख सच्चा सिद्ध करे, सद्गुरु के उपदेश पालन में कभी आलस्य न करे । इन लक्षणों से युक्त पुरुष ही सच्चा शिष्य कहलाता है और ये ही लक्षण परमात्मा की प्राप्ति के साधन है । अतः इन लक्षणों से परिपूर्ण होता हुआ ब्रह्म को प्राप्त करे ॥५५-५६॥
(क्रमशः)

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