शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

= ७८ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷

🙏 *#श्रीदादूअनुभववाणी* 🙏

*द्वितीय भाग : शब्द*, *राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*

साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, राज. ॥

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७८ - निज स्थान निर्णय । दीपचन्दी
मैं मेरे में हेरा, मध्य माँहिँ पीव नेरा ॥टेक॥
जहं अगम अनूप अवासा, तहं महापुरुष का वासा ।
तहं जानेगा जन कोई, हरि माँहिं समाना सोई ॥१॥
अखँड ज्योति जहं जागे, तहं राम नाम ल्यौ लागे ।
तहं राम रहे भर पूरा, हरि संग रहे नहिं दूरा ॥२॥
तिरवेणी तट तीरा, तहं अमर अमोलक हीरा ।
उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥३॥
दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा ।
पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥४॥
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७८ - ७९ में निश्चय किये हुये अपने अधिष्ठान रूप स्थान को बता रहे हैं - 
जब मैंने ध्यान द्वारा अपने में ही खोजा, तब परमात्मा मेरे अति समीप हृदय के मध्य में ही प्राप्त हुये । जहां बाह्य इन्द्रियों से अगम अनुपम अष्टदल - कमल रूप निवासस्थान है, उसी में ही महापुरुष परब्रह्म का विशेष रूप से निवास है । ध्यान द्वारा वहां पर स्थित परब्रह्म को जो भी जन जानेगा, वह परब्रह्म में ही समा जायगा । 
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जहां हृदय देश में आत्म रूप अखँड ज्योति जगती है, वहां ही राम - नाम द्वारा राम में वृत्ति लगती है । वहां ही विश्व में परिपूर्ण राम विशेष रूप से रहते हैं, इसलिए हरि संग ही रहते हैं, दूर नहीं । 
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आज्ञा - चक्र में इडा, पिंगला, सुषुम्ना का संगम रूप त्रिवेणी तट है । वहां उसके तीर पर ही ध्यान द्वारा अमर ब्रह्म रूप अमूल्य हीरा प्राप्त होता है । जब उस ज्ञान रूप हीरे के विचार में हमारा मन लगा, तब हमारा सम्पूर्ण भेद - जन्य भ्रम और भय नष्ट हो गया । 
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उस ज्ञान के द्वारा हम अनायास ही ब्रह्म को देख पाये हैं और वह हमारे संग ही प्रतीत हुआ है । अब उस परमाश्रय पूर्णब्रह्म अपने भगवान् को हम निरन्तर देखते रहते हैं ।
(क्रमशः)

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