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*सब सौं संग नहीं पुनि मेरे, अरस परस कुछ नाँहीं हीं ।*
*एक अनंत सोई संग मेरे, निरखत हूँ निज मांहीं ॥*
*तन मन मांहिं शोध सो लीन्हा, निरखत हूँ निज सारा ।*
*सोई संग सबै सुखदाई, दादू भाग्य हमारा ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३४४)
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साभार ~ Shaily Rai
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मैं पहाडों में था। कुछ मित्र साथ थे। एक दिन हम एक ऐसी घाटी में गए, जहां पहाडियां बहुत स्पष्ट प्रतिध्वनि करती थीं। एक मित्र ने कुत्ते की आवाज की तो पहाड में कुत्ते बोलने लगे और फिर किसी ने कोयल की आवाज की तो घाटी कुहू-कुहू से गूंजने लगी।
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मैंने कहाः ‘‘संसार भी ऐसा ही है। उसकी ओर हम जो फेंकते हैं, वही हम पर वापस लौट आता है। फूल फूल ले आते हैं और कांटे कांटे। प्रेमपूर्ण हृदय के लिए सारा जगत प्रेम की वर्षा करने लगता है और घृणा से भरे व्यक्ति के लिए सब ओर पीडादायी लपटें जलने लगती हैं।’’
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फिर मैंने उन मित्रों से एक कहानी कहीः एक छोटा सा लडका पहली बार अपने गांव के पास के जंगल में गया था। वह एकांत से भयभीत और बहुत चैकन्ना था। तभी उसे झाडियों में कुछ सरसराहट सुनाई पडी। निश्चय ही कोई व्यक्ति छिपा हुआ उसका पीछा कर रहा था।
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उसने जोर से चिल्ला कर पूछाः ‘‘कौन है? ’’ और भी जोर से पहाडियों ने पूछाः ‘‘कौन है? ’’ अब तो किसी के छिपे होने का उसे पूर्ण निश्चय हो गया। भयभीत तो वह वैसे ही था। उसके हाथ-पैर कांपने लगे और हृदय जोर-जोर से धडकने लगा।
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लेकिन स्वयं को साहस देने के लिए उसने छिपे हुए आदमी से कहाः ‘‘डरपोक !’’ प्रतिध्वनि हुईः ‘‘डरपोक !’’ अंतिम बार उसने शक्ति जुटाई और चिल्लायाः ‘‘मैं मार डालूंगा !’’ पहाड और जंगल भी जोर से चिल्लाएः ‘‘मैं मार डालूंगा !’’ तब वह लडका सिर पर पैर रख कर गांव की ओर भागा।
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उसके ही पैरों की प्रतिध्वनि उसे ऐसी लगती थी जैसे वह आदमी उसका पीछा कर रहा है। अब उसमें लौट कर देखने का भी साहस नहीं था। वह घर के द्वार पर जाकर गिर पडा और बेहोश हो गया। होश में आने पर सारी बात पता चली।
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सुन कर उसकी मां खूब हंसी और बोलीः ‘‘कल फिर वहीं जाना और जो मैं बताऊं वह उस रहस्यमय व्यक्ति से कहना। मैं तो उससे भलीभांति परिचित हूं। वह तो बहुत ही भला और प्यारा आदमी है।’’ वह लडका कल फिर वहां गया।
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उसने जाकर कहाः ‘‘मेरे मित्र !’’ प्रतिध्वनि हुईः ‘‘मेरे मित्र !’’ इस मैत्रीपूर्ण ध्वनि ने उसे आश्वस्त किया। उसने कहाः ‘‘मैं तुम्हें प्रेम करता हूं !’’ पहाडों ने, जंगलों ने, सभी ने दुहरायाः ‘‘मैं तुम्हें प्रेम करता हूं !’’ क्या प्रतिध्वनि की कथा ही हमारे तथाकथित जीवन की कथा नहीं है?
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और क्या हम सब संसार के जंगल में ऐसे बाल अजनबी ही नहीं हैं, जो अपनी ही प्रतिध्वनियों को सुनते हैं, भयभीत होते हैं और भागते हैं? क्या सच ही स्थिति ऐसी ही नहीं है?
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लेकिन स्मरण रहे कि ‘‘मैं मार डालूंगा !’’ यह प्रतिध्वनि है, तो ‘‘मैं तुम्हें प्रेम करता हूं !’’ यह भी प्रतिध्वनि ही है। पहली प्रतिध्वनि से मुक्त होकर दूसरी के प्रेम में पड जाना बालपन से छुटकारा नहीं है।
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कुछ पहली प्रतिध्वनि से भयभीत होते हैं, कुछ दूसरी प्रतिध्वनि में मोहग्रस्त। लेकिन बुनियादी रूप से उन दोनों में कोई भेद नहीं है। अप्रौढ़ता दोनों में ही छिपी है। जो जानता है, वह दोनों भ्रमों से मुक्त होकर जीता है। जीवन का सत्य प्रतिध्वनियों में नहीं, वरन स्वयं में ही अंतर्निहित है।
मिट्टी के दीये ~ ओशो

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