शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

गुरुदेव का अंग ४५/४९

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
*सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ ।* 
*दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥४५॥* 
जैसे चारों तरफ जल से भरे तालाब पर जाकर भी कोई पक्षी अतृप्त हुआ ही इधर-उधर भ्रमण करता है तो इसमें किसका दोष कहें? तालाब का तो है नहीं, यह दोष तो पक्षी का ही माना जायेगा । इसी प्रकार यद्यपि शुद्ध ब्रह्म सर्वव्यापक है, तथापि जीवात्मा कामनाओं से इधर-उधर भटकता हुआ समीप ही वर्तमान कूटस्थ चैतन्य को गुरु कृपा विना नहीं देख सकता और न उसकी ब्रह्मप्राप्ति के साधनों में ही प्रवृत्ति ही हो पाती है । अतः प्रयत्नपूर्वक ब्रह्म जिज्ञासा करनी चाहिये ॥४५॥ 
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*मानसरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ ।*
*दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥४६॥* 
मानसरोवर का शुद्ध जल कोई प्यासा ही, वहाँ जाकर पीयेगा, दूसरा नहीं । इसी प्रकार परमात्मा सब के हृदयसरोवर में विद्यमान है । श्रुति में लिखा है- 
एक ही भूतात्मा प्रत्येक भूत में व्यवस्थित है । एक रूप से तथा अनेक रूपों से दीखता है । तथापि गुरु के पास गये विना चेतनानन्द-जल का पान नहीं कर सकता । घर घर जाकर तो गुरु उपदेश कर नहीं सकते, अतः ब्रह्मजिज्ञासु को गुरु के पास ही जाना चाहिये । यही शास्त्रमर्यादा है । 
श्रुति में लिखा है- 
“शिष्य को हाथ में समिधा लेकर ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिये गुरु के पास ही जाना चाहिये । गुरु भी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिये ॥४६॥ 
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*गुरु तथा शिष्य को अंग* 
*दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गमि होइ ।* 
*लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोइ ॥४७॥* 
कैसा गुरु होना चाहिए? इस शंका का उत्तर “दादू गुरु गर्वा मिल्या” इस साखी वचन से श्रीदादू दयाल जी महाराज दे रहे हैं कि :: गंभीर गुणों वाला, अज्ञान को नष्ट करने वाला,जन्म कर्म का नाशयिता, ज्ञान वैराग्य का प्रदाता ही “गुरु” होता है । जो शिष्य की,आंखों में ज्ञान का अंजन लगाकर, आँखे खोल देते हैं । उन गुरु को मेरा प्रणाम है । 
जैसे पारसमणि का लोहे से स्पर्श होते ही स्वर्ण बन जाता है, ऐसा गुरु होना चाहिए । 
*दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर ।* 
*सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥४८॥* 
संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयालजी महाराज गुरु के लक्षण बता रहे हैं- जो गम्भीर ज्ञान वाला हो, निराभिमान हो, धैर्यवान हो, शान्त दान्त दयालु और धीर हो, क्षणमात्र में ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ हो, वही 'सद्गुरु' होता है ।
(क्रमशः)

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