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*तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।*
*मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *प्रेमा भक्ति*
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विल्लमंगल वृन्दावन जा रहे थे । मार्ग में एक सुन्दर स्त्री को देख कर उसके पीछे हो लिये । वह अपने घर में घुस गई और वील्वमंगल द्वार पर खड़े हो गये । उस स्त्री का पति भगवत भक्त था । उसने विल्वमंगल को अपने घर ठहराया और सप्रेम सेवा की ।
फिर विल्वमंगल के मन में विचार उठा कि नेत्रों से इस स्त्री को नहीं देखता तो मेरी यह दशा न होती । इस लिये नेत्र भगवत प्रेम में बाधक है । फिर उन्होंने उस स्त्री से दो सूई मँगवा कर अपने नेत्रों में मार ली और अंधे हो गये ।
इससे सूचित होता है कि हरि प्रेमी हरि प्रेम में बाधक वस्तु को हटा देते हैं ।
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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