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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= (९. गणना छप्पै पंचक. ४) =*
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*बारह मास के नाम*
*कार्तिक काटै कर्म मार्गशिर गति यज्ञासा ।*
*पोष मिल्यौ सतसंग माघ सब छाडी आसा ॥*
*फाल्गुन प्रफुलित अंग चैत्र सब चिंता भागी ।*
*बैषाषा अति फला जेष्ठ निर्मल मति जागी ॥*
*आषाढ गयौ आनन्द अति श्रावण श्रवति अमी सदा ।*
*भाद्रव द्रवति परब्रह्म जदि अश्विनी शांति सुंदर तदा ॥४॥*
*बारह मास उपदेश श्रवण का क्रमिक फल*
इस कवित्त में महात्मा बारह मासों में से प्रत्येक मास में कृत सत्संग का फल बता रहे हैं –
*कार्तिक* मास में गुरुपदेश के श्रवण से कर्मबन्धन कट जाते हैं ।
*मार्गशीर्ष* में उसके श्रवण से ज्ञानजिज्ञासा शान्त होती ।
*पौष* मास के श्रवण से सत्संग की प्राप्ति होती है ।
*माघ* मास के श्रवण से वासना(इच्छा) का शमन होता है ।
*फाल्गुन* मास में श्रवण से साधक का चित्त प्रफुल्लित रहता है ।
*चैत्र* मास में श्रवण से सभी सांसारिक चिन्ताएँ विनष्ट हो जाती है ।
*ज्येष्ठ* मास में उसके श्रवण से साधक की मति स्वच्छ तथा ज्ञानप्राप्ति के लिये उत्सुक हो जाती है ।
*श्रीसुन्दरदास जी* कहते हैं –
*आषाढ़* मास में उसी मति से आनन्द,
*श्रावणमास* में अमृत स्त्रवण एवं
*भाद्रपद* मास में परब्रह्म का चिन्तन करते करते वह
*आश्विन* मास में ब्रह्ममय हो जाता है । तब उसके हृदय में स्थायी शान्ति का आवास हो जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

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