🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात ।*
*दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*सुकृत का अंग ९५*
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हरि हित दशवंध१ खर्च तों, आवे दशा सु द्वारि ।
रज्जब राजा चोर यम, ले२ हर३ सके न मारि४ ॥६१॥
ईश्वर के लिये दशोंन१(कमाई के सौ में से दश) खर्च करने पर द्वार पर सुन्दर दशा ही रहती है अर्थात सुख ही रहता है । उसके धन को राजा नहीं लेता२ है चोर नहीं हरते३ और उसे यम भी दंड४ नहीं दे सकता ।
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सर्वस्व दीजे तो भला, नहिं तो दशवंध काढि ।
रज्जब अज्जब बात यहु, बहु कहैं क्या बाढि ॥६२॥
अपना सब कुछ प्रभु के लिये दे तब तो अच्छा ही है, नहीं तो दशोंन तो अवश्य निकालना चाहिये । बहुत बढाकर क्या कहें, यह भगवत अर्थ देना रूप बात अदभुत है ।
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अतीत१ अवनि२ हाली सती३, बीज विभूति४ सँभालि ।
कर मुकतों५ मुकती६ किरखि७, मूठि मूंद तहँ ठालि८ ॥। ६३॥
संत१ रूप पृथ्वी२ है, सदगृहस्थ३ हाली है और ऐश्वर्य४ बीज है, जैसे हाली हाथ की मुठ्ठी को खुली५ रखकर बीज डालता है वहाँ तो खेती७ बहुत६ होती है और मुठ्ठी बंद कर लेता है वहाँ खेत खाली८ रह जाता है, वैसे ही सदगृहस्थ संतों की सेवा करता है तब तो उसका सुकृत बढता है और नहीं करता तो सुकृत से रहित रहता है ।
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कृपण सु गल थन१ दानि थन, अजा२ सु उकरी३ माँहि ।
जन रज्जब श्रवते४ सफल, नीझर५ निरफल जाँहिं ॥६४॥
माया रूपी बकरी के कृपण तो गले के स्तन है और दानी दूध के स्तन हैं, इसमें जो दान रूप दूध देता है वे दानी तो सफल है और नहीं देने वाले कृपण निष्फल हैं ।
(क्रमशः)

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