मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

विरह का अंग ३२/३५

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग-३)*
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*छिन विछोह*
*क्या जीये में जीवना, बिन दर्शन बेहाल ।*
*दादू सोई जीवना, प्रकट परसन लाल ॥३२॥*
*इहि जग जीवन सो भला, जब लग हिरदै राम ।*
*राम बिना जे जीवना, सो दादू बेकाम ॥३३॥*
जिस जीवन में भगवान् का दर्शन, उसका कोमल चरणस्पर्श व साक्षात्कार, उसके साथ बातचीत होती रहे-भक्तों का वही जीवन श्रेष्ठ माना जाता है । दिन रात विरह व्यथा से पीड़ित जीवन से क्या लाभ? भक्त का जीवन भोगों के लिये नहीं होता, किन्तु भगवद्भक्ति के लिये ही होता है । भोगमय जीवन तो मृत्युतुल्य होता है ॥३२-३३॥
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*बिरह विनती*
*दादू कहु दीदार की, सांई सेती बात ।*
*कब हरि दरशन देहुगे, यहु औसर चलि जात ॥३४॥*
हे स्वामिन् ! मेरा यह जीवन प्रतिक्षण नदी-प्रवाह की तरह बहता चला जा रहा है, अब अप ही बताइये-आप मुझे कब दर्शन देंगे? ॥
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*बिथा तुम्हारे दर्श की, मोहि व्यापे दिन रात ।*
*दुखी न कीजे दीन को, दर्शन दीजे तात ॥३५॥*
मेरे हृदय में केवल प्रभुदर्शन की व्यथा है और वह व्यथा मुझे दिन रात सताती रहती है । हे प्रभो ! मुझे अपना दीन, शरणागत मानकर अब ज्यादा दुःखी न करें, किन्तु दया करके शीघ्र ही दर्शन दें । भक्ति रसायन में लिखा है-
आप का यश तीनों तापों एवं पापों को हरने वाला है और उसे संसार में कवियों ने बहुत मंगलमय बताया है । इसीलिये दर्शनों की इच्छा से ही ये गोपियाँ, ऐसा विचार कर आपका यश गा रही हैं । अतः दर्शन देकर पापशाप को दूर करो ॥३५॥
(क्रमशः)

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