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*श्रवणों शब्द ज्यूं सुनै कुरंग,*
*ज्योति पतंग न मोड़ै अंग ।*
*जल बिन मीन तलफि ज्यों मरै,*
*दादू सेवक ऐसै करै ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३७५)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *लीलानुकरण भक्ति*
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लीलानुकरण नामक एक ब्राह्मण भक्त पुरुषोत्तम पुरी में रहा करते थे । एक बार नृसिंह चर्तुदशी के दिन नृसिंह लीला में उन्हें नृसिंह बनाया गया । जब हिरणाकशिपु के वध का समय आया तब नृसिंह रूप ने उसे नखों से फाड़ करके मार दिया । कुछ लोगों ने ने कहा - यह शत्रुता से किया गया है किंतु भक्तों ने कहा नहीं, इस समय इनमें नृसिंह भगवान का अंश आ गया था इसलिये ऐसा हुआ है ।
फिर सबका निश्चय हुआ कि राम लीला में दशरथ बनाया जाय फिर पता चल जायेगा ।" फिर उन्हे राम लीला में दशरथ बनाया गया। सुमन्त से जब सुना कि राम पीछे नहीं आये है तब तत्काल ही प्राण छोड़ दिये । इसी से उनका नाम लीलानुकरण पड़ गया । इससे सुचित होता है कि कभी कभी लीलानुकरण भी सत्य ही हो जाता है ।
लीलानुकरण कभी तो, सत्यहि देखा जाय ।
लीलानुकरण ने तुरन्त, प्राण दिये छिटकाय॥२१०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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