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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग-३)*
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*विरह विनती*
*दादू दरूने दर्दबंद, यहु दिल दर्द न जाइ ।*
*हम दुखिया दीदार के, महरबान दिखलाइ ॥२९॥*
हे दयालु परमात्मन् ! कृपया दर्शन दीजिये; क्योंकि मैं आपके दर्शनों के लिये व्यथित हो रहा हूँ । जब तक आपके दर्शन न होंगे तब तक तैं सुखी नहीं होऊँगा । भागवत के गोपी-गीत-प्रकरण में लिखा है-
“हे प्रिय परमात्मन् ! कृपा कर दर्शन दीजिये, क्योंकि हम आपके हैं । अपने प्रेमियों को दर्शन देना चाहिये । हमारे प्राण भी आपके पास ही है । आपके होकर भी हमें आपको तलाश करना पड़ रहा है और आपको तलाश भी सभी दिशाओं में करना पड़ रहा है, जबकि आप हमारे हृदय में ही स्थित हैं । हमारा मन आप में आसक्त है, अतः हम दर्शन के अधिकारी हैं ।”
श्रीभक्तिरसायन में भी लिखा है-
“हे नाथ ! इस भूमि पर जिन्होंने योग-साधना नहीं की उनको आपके प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते । यह आपकी वाणी कुछ समझ में आती है, किन्तु जो दिन-रात आपके संयोग में आसक्त-चित्त वाले भक्त हैं, उनको भी दर्शन नहीं हो रहा-यह तो उचित नहीं ॥२९॥”
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*मूये पीड़ पुकारतां, बैद न मिलिया आइ ।*
*दादू थोड़ी बात थी, जे टुक दर्श दिखाइ ॥३०॥*
विरहव्यथा से पीड़ित हृदय से बार बार आर्त स्वर से प्रार्थना करते करते हुए मेरा कितना समय व्यतीत हो गया? लेकिन अभी भी विरहरोग का चिकित्सक वैद्य नहीं आया । मेरी दर्शन की प्रार्थना तो बहुत छोटी सी है, जबकि आप सब कुछ प्रदान करने में समर्थ हैं । फिर दर्शन देने के लिए आप यह कृपणता क्यों कर रहे है? अर्थात् आपकी यह दर्शन देने में कृपणता उचित नहीं है । भक्तिरसायन में लिखा है-
“जो योगवृत्ति से भी नहीं जाना जा सका, श्रुति भी जिसको तात्त्विक रूप से न जान सकी, उसका अपरोक्ष दर्शन चाहने वालों को प्रायः परिश्रम ही करना पड़ता है, जैसे कि गोकुलवासिनी गोपियों की दर्शन के लिये कितना कष्ट सहना पड़ा ॥३०॥”
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*दादू मैं भिखारी मंगता, दर्शन देहु दयाल ।*
*तुम दाता दुख भंजता, मेरी करहु संभाल ॥३१॥*
हे करुणासागर ! मैं भिक्षुक बनकर तेरे द्वार पर दर्शनभिक्षा के लिये आया हूँ । इसलिये आप दर्शन दें । मैं तो आपको कृपालु दाता, एवं दुःखभंजक समझ आपके द्वार पर आया हूँ । ऐसा न हो कि आपके ये विशेषण व्यर्थ हो जाय । अतः अभिलाषभरी एवं अनुरागयुक्त मेरी इस आशालता को काटो मत और यों अपने ऐश्वर्ययश को कलंकित न करो ! ॥३१॥
(क्रमशः)

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