सोमवार, 16 दिसंबर 2019

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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।* 
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी​ 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भाग ३* *भक्त*
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प्रसिद्ध भक्त जयदेव के पिता में उनके ही गांव का निरंजन नाम का ब्राह्मण कर्ज मांगता था । जयदेव के माता पिता परलोक पधार गये । निरंजन ने जयदेव का सब घर कर्ज में अपने नाम लिख दिया था । इस अनुचित कार्य से उसके घर में अग्नि लगी । जब जयदेव जी को पता चला तो वे भाग कर उसके घर में जा धुसे । इससे तत्काल अग्नि बुझ गई तथा निरंजन को भी बड़ा लाभ हुआ, उसका मन शुद्ध हो गया । इससे सुचित होता है कि देवता भी भक्त की रुख रखते हैं ।
ईस भक्त रुख राखते, सुर भी सत्य समान ।
विप्र निरंजन घर बुझा, गति जयदेव हि जान ॥३९७॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
### सत्यराम सा ###

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