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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= (९. गणना छप्पै पंचक. ३) =*
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*सप्त बारों के नाम*
*प्रगट होइ आदित्य सोम जब हृदयें आवै ।*
*मंगल दशहू दिशा बुद्ध तब ही ठहरावै ॥*
*बृहस्पति ब्रह्म स्वरूप शुक्र सब भाषत ऐसैं ।*
*थावर जंगम मध्य द्वैत भ्रम रहै सु कैसैं ॥*
*है अति अगम्य अरु सुगम पुनि सद्गुरु बिन कैसैं लहैं ।*
*यह बार हि बार बिचार करि सप्तबार सुन्दर कहै ॥३॥*
(इस कवित्त में अन्योक्ति से सात वारों का नाम भी स्मरण किया गया है । जैसे -)
जब साधक के हृदय में ज्ञानसूर्य उद्भुत होता है तब शान्ति(सोम) स्वतः ही उद्भूत होने लगती है । इसी कारण तब सर्वत्र सुख का भी प्रकाश होने लगता है । उस दिशा में ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति सरल हो जाती है । क्योंकि उस समय शुक्राचार्य ब्रह्मज्ञान का ऐसा निरूपण आरम्भ करते हैं कि संसार की सभी स्थावर जंगम सृष्टि में उत्पन्न द्वैत का भ्रम स्वतः ही नष्ट होने लगता है ।
यद्यपि यह अद्वैत ज्ञान के बिना प्राप्त होना अतिशय कठिन है । तथापि श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं – गुरुदेव से बार बार पूछ कर निरन्तर विचार करने पर यह समझ में आ ही जता है ॥३॥
(क्रमशः)

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