🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*सुकृत का अंग ९५*
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द्रौपदी सुदामा दादू दत्तवी१, तिमरलिंग का त्याग ।
रज्जब पात्र जु पूजते, भृत२ हुँ भूरि३ सभाग४ ॥५७॥
द्रौपदी, सुदामा और दादू का क्या दान१ था ? कौपीन, चावल और एक पैसा ही तो था । तिमरलिंग का त्याग क्या था? चार रोटी ही तो दी थी किन्तु उन्होंने सुपात्रों को दिया था, इससे पूजे जाते हैं । जो बहुत३ भाग्यशाली४ होते हैं उन्हीं भक्तों२ को सुपात्र मिलते हैं ।
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पंच भरतारी१ पुण्य का, कहा सुदामा दीन ।
जन रज्जब लघु दान पर, बड़हु२ बड़ी पर३ कीन४ ॥५८॥
द्रौपदी१ का क्या पुण्य था ? और सुदामा ने क्या दिया था ? किन्तु छोटे से दान पर भी बड़ों२ ने तो बड़ी श्रेष्ठ३ सहायता करी४ थी ।
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देखि सुदामा द्रौपदी, दान तनिक१ तुछ२ कीन ।
ता परि ता के कनक घर, बाहिं३ अमित पट दीन ॥५९॥
देखो, सुदामा ने थोड़े से१ चावल दिये थे, उस पर उसके लिये सुवर्ण का महल बना दिया था । द्रोपदी ने तुच्छ२ कौपीन का वस्त्र दिया उस पर उसका३ वस्त्र अपार कर दिया था ।
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देना सब ठाहर भला, जे कुछ दिया जु जाय ।
ताही माँही विशेष यहु, जु खर्चे भगवत भाय१ ॥६०॥
यदि कुछ दिया जाय तो देना सभी जगह अच्छा है किन्तु उन सब में वह विशेष है जो भगवान के उद्देश्य१ से खर्च किया जाय ।
(क्रमशः)

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