🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग केदार ६(गायन समय सँध्या ६ से ९ रात्रि)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१२८ - (गुजराती भाषा) त्रिताल
वाहला हूं जाणूं जे रंग भरमिये,
मारो नाथ निमिष नहिं मेलूँ रे ।
अन्तरजामी नाह१ न आये,
ते दिन आव्यो२ छेलो३ रे ॥टेक॥
वाहला सेज अमारी एकलड़ी रे,
तहं तुजने केम न पामेँ४ रे ।
आ५ दत्त६ अमारो७ पूरबलो रे,
तेतो आव्यो सामोल रे ॥१॥
वाहला मारा हृदया भीतर केम न आये,
मने चरण विलम्बन८ दीजे रे ।
दादू तो अपराधी तारो,
नाथ उधारी लीजे रे ॥२॥
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हे प्रियतम ! मैं चाहता हूं - वृत्ति में प्रेम - रँग भरकर प्रभु से खेलूँ और मेरे स्वामी को एक निमेष मात्र भी न छोडूँ किन्तु आप स्वामी१ तो अन्तर्यामी होने पर भी नहीं आते और वह अन्त३ समय का दिन समीप आ गया२ है ।
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प्रियतम ! मेरी हृदय - शय्या आपके बिना खाली है, उस पर मैं आपको क्यों नहीं प्राप्त४ करता ? यह५ आपके वियोग से व्यथित होना मेरे७ पूर्व कर्म६ का फल ही सामने आया है । प्रियतम !
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मेरे हृदय में क्यों नहीं आते ? अब आप विलम्ब न करके मुझे अपने चरणों का आश्रय८ दें । यद्यपि मैं अपराधी हूं किन्तु हूं आपका ही । अत: हे नाथ ! शीघ्र ही दर्शन देकर वियोग - व्यथा से मेरा उद्धार करें ।
(क्रमशः)

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