🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग केदार ६(गायन समय सँध्या ६ से ९ रात्रि)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१२९ - पँचमताल
तूँ छे मारो राम गुसांई,
पालवे१ तारे बांधी रे ।
तुज बिना हूं आँतरे२ र वल्यो३,
कीधी४ कमाई लीधी रे ॥टेक॥
जीवूँ जेटला५ हरि बिना रे,
देहड़ी दुखे दाधी रे ।
अेणे६ अवतारे काँई न जाण्यूँ,
माथा टक्कर खाधी रे ॥१॥
छूट७ को मारो क्यारे८ थाशे९,
शक्यो न राम अराधी रे ।
दादू ऊपर दया मया१० कर,
हूं तारो अपराधी रे ॥२॥
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राम ! आप ही मेरे स्वामी हैं, मैंने आपका ही आश्रय१ पकड़ा है । आपके भजन बिना मैं अब तक आप से दूर२ ही भटकता३ रहा, यह भी मेरे किये४ कर्मों का ही फल मिला है ।
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अब मैं हरि दर्शन बिना जब तक५ जीवित रहूंगा, तब तक मेरा देह दु:खों से जलता रहेगा । इस६ जन्म में मैं अपने कल्याण का साधन कुछ भी न समझ सका और शिर पर टक्करें ही खाता रहा अर्थात् इधर - उधर भटकता रहा ।
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मेरा उद्धार७ कब८ होगा९ ? मैं राम की उपासना भी न कर सका । प्रभो ! मैं अपराधी हूं, किन्तु हूं आपका ही । अत: मुझ पर प्रेम पूर्वक१० दया ही करना ।
(क्रमशः)

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