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*माया मारै जीव सब, खंड खंड कर खाइ ।*
*दादू घट का नास कर, रोवै जग पतियाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया जड़ चेतन का अंग १०६*
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पंच तत्त्व जीवहिं सदा, आतम अमर अनादि ।
जन रज्जब बिछुरहि मिलहिं, मूये कहै सो बादि१ ॥९॥
आकाशादि पंच तत्त्व सदा जीवित रहते ही हैं, आत्मा अमर और अनादि हैं ही, ये बिछुड़ते हैं और मिलते हैं । जो मरने की बात कहते है सो व्यर्थ१ है ।
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ब्रह्म काम ब्रह्माण्ड सु चेतन, रज्जब रजा१ सु होय ।
मूई जीवती मांड२ को, बूझे बिरला कोय ॥१०॥
ब्रह्म की आज्ञा१ होने पर ब्रह्म के काम के लिये ब्रह्माण्ड सम्यक चेतन है किन्तु इस ब्रह्माण्ड२ मरने तथा जीवित रहने वाले के रहस्य को कोई विरला ही समझता है ।
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माया मनसा मरे न कबहूं, जाल्यों१ भूत होत है अबहूं ।
जड़ चेतन देखी हरिसिद्धि२, मूई जीवतों खाय सु गिद्धि ॥११॥
माया और मन की आशा कभी न मरती, अब भी जलाने१ पर भूत हो जाती है । इसी प्रकार माया२ जड़ और चेतन दोनों ही गुणों वाली देखी गई है । जैसे गिद्धनी रण में घायल जीवत और मरे वीरों को खाती है, वैसे ही यह माया में जीवतजनों को खाती है ।
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गुड़ महुआ अरु बेरि जड़, जल ज्वाला मिल मद्द१ ।
यू पंच तत्त्व मिल माया पाकी, जीव करन को रद्द२ ॥१२॥
गुड़, महुआ अरु बेरि जड़, जल और अग्नि ये पांचों मिलकर मानव को खराब२ करने के लिये मद्य१ पकाता है, वैसे ही आकाशादि पांच तत्त्व मिलकर जीव को खराब करने के लिये माया पकी है ।
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रज्जब मूई न मृत्तिका, अदभू१ ऊगै माँहिं ।
अंतक२ मुख अबला३ भये, तनै४ तनैया५ नाँहिं ॥१३॥
मृत्तिका मरी नहीं है कारण - उससे वृक्ष१ उत्पन्न होते हैं, नारी३ काल२ के मुख में चली जाय तो उसके शरीर४ से पुत्र५ उत्पन्न नहीं हो सकता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित माया जड़ चेतन का अंग १०६ समाप्तः ॥सा. ३२७७॥
(क्रमशः)

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