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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९६ - अन्य उपासक विस्मयवादी भ्रम । रँगताल
सांचा राम न जाणैं रे,
सब झूठ बखाणैं रे ॥टेक॥
झूठे देवा झूठी सेवा,
झूठा करै पसारा ।
झूठी पूजा झूठी पाती,
झूठा पूजणहारा ॥१॥
झूठा पाक करै रे प्राणी,
झूठा भोग लभावै ।
झूठा आड़ा पड़दा देवै,
झूठा थाल बजावै ॥२॥
झूठे वक्ता झूठे श्रोता,
झूठी कथा सुनावै ।
झूठा कलिजुग सब को माने,
झूठा भरम दृढावै ॥३॥
स्थावर जँगम जल थल महियल१,
घट घट तेज समाना ।
दादू आतम राम हमारा,
आदि पुरुष पहिचानां ॥४॥
परमात्मा से भिन्न अन्य की उपासना करने वालों का आश्चर्य तथा उनका भ्रम दिखा रहे हैं - साँसारिक सभी प्राणी सत्य स्वरूप राम को नहीं जानते, मिथ्या का ही कथन करते हैं ।
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उनके देव, सेवा, सब फैलाव, पूजा, पात्रादि, पुजारी सब मिथ्या ही हैं ।
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प्राणी मिथ्या पदार्थों के पाक बनाते हैं, मिथ्या पड़दा लगाते हैं और मिथ्या ही भोग लगा कर मिथ्या ही थाल बजाते हैं ।
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कर्त्तव्य शून्य झूठे वक्ता झूठी कथा सुनाते हैं और झूठे श्रोता सुनते हैं । झूठे कलियुगी प्राणी सब प्रकार मिथ्या को ही मानते हैं और अन्यों को भी मिथ्या भ्रम ही दृढ़ कराते हैं किन्तु...
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हमने तो जल, स्थल तथा नभ१ के स्थिर और चलने वाले सभी प्राणियों के घट - घट में जो आदि पुरुष चेतन तेज समाया हुआ है, उसी को पहचाना है । वह राम ही हमारा आत्म - स्वरूप है ।
(क्रमशः)

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