मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२. स्मरण का अंग ~ १/४*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १/४*
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प्रथम श्रवण सुनि नांव ले, दूजे रसनां गाइ ।
तृतिय हृदै प्रकास करि, रोम रोम रटि ताहि ॥१॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि पहले प्रभु का नाम कानों से सुन लें, फिर जिह्वा से गायें, फिर हृदयस्थ करें । जिससे ज्ञान का प्रकाश हो व रोम रोम से उस प्रभु को भजें ।
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संधै संधि जुडै तहां, चौथा गन की चाहि ।
कहि जगजीवन प्रीति सौ, रांम हृदै लिव१ लाइ* ॥२॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि क्रमानुसार श्रवण, गायन, मनन करने से चौथी अवस्था ... चिन्तन-ज्ञान का प्रकाश होगा, रोम रोम से उस प्रभु को भजने की लय जगेगी ।
(*. १-२ साखियों से तुल.-श्री दादूवाणी २/२,३)
(१. लिव=लय{तन्मयता=एकाग्रता})
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एक सांस सहसर बदन, जुगल रसन हरि नांम ।
किंचित२ सुमिरन अलख का, जगजीवन निज ठांम ॥३॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि प्रभु स्मरण एक श्वास में भी इस प्रकार हो जैसे हजारों मुख से होता है और जो दृष्टव्य नहीं है उस प्रभु का कुछ ऐसा भजन ही संत अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते हैं ।
(२. किंचित-किंञ्चित = कुछ)
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इस थैं आगै ऊपजै, रोम रोम लै लीन ।
कहि जगजीवन प्रीति अस, ज्यूं जल सेती मीन ॥४॥
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि इतना प्रयास करने से रोम रोम प्रभु भक्ति में लीन होता है और ऐसा प्रेम उपजता है जैसे मछली का जल से होता है, वही उसका आधार होता है, क्षण भर भी नाम के विरह में वह मछली की तरह तडपता है ।
(क्रमशः)

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