🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१८८ - मन प्रति शूरातन । त्रिताल
हरि मारग मस्तक दीजिये,
तब निकट परम पद लीजिये ॥टेक॥
इस मारग माँहीं मरणा,
तिल पीछे पाँव न धरणा ।
अब आगे होइ सो होई,
पीछे सोच न करणा कोई ॥१॥
ज्यों शूरा रण झूझै,
तब आपा पर नहिं बूझै ।
शिर साहिब काज संवारै,
घण घावां आपा डारै ॥२॥
सती सत गहि सांचा बोलै,
मन निश्चल कदे न डोलै ।
वाके सोच पोच जिय ना आवै,
जग देखत आप जलावै ॥३॥
इस शिर सौं साटा कीजै,
तब अविनाशी पद लीजै ।
ताका तब शिर साबत होवै,
जब दादू आपा खोवै ॥४॥
मन को शौर्य की प्रेरणा कर रहे हैं - प्रभु प्राप्ति के मार्ग में अपना अहँकार रूप शिर दिया जायगा, तब हृदय में समीप ही परमात्मा रूप परम पद प्राप्त होगा ।
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इस परमार्थ मार्ग में मरने का प्रसंग आ जाये तो भी एक तिल भर भी पीछे नहीं हटना चाहिए । इसमें प्रवृत्त होने पर आगे जो होता है, वही होगा अर्थात् प्रभु ही प्राप्त होगा । पीछे के धन, जनादि का सोच कोई भी न करे ।
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जैसे वीर युद्ध क्षेत्र में युद्ध करता है, तब अपने पराये का ज्ञान उसे नहीँ रहता । वह शिर देकर भी अपने स्वामी का कार्य ठीक करता है, वैसे ही साधक विवेक - वैराग्यादि शस्त्रों के बहुत - से घावों द्वारा अपना अहँकार त्याग कर प्रभु को प्राप्त करे ।
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सती सत्य ग्रहण करके आगामी सत्य बातें कहती है, उसका मन निश्चल रहता है, कभी भी चँचल नहीं होता, उसके मन में कायरता और चिन्ता नहीं आती, जगत के प्राणियों के देखते - देखते अपने शरीर को जलाकर पति - लोक को जाती है, वैसे ही सँत प्रभु - परायण होकर प्रभु को प्राप्त होते हैं ।
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जब अविनाशी पद के बदले में अपना अहँकार - शिर दिया जाता है तब ही अविनाशी पद प्राप्त होता है । जब प्राणी अपने जीवत्व अहँकार को नष्ट कर देता है, तब उसका शिर पूर्ण प्रमाणित माना जाता है ।
(क्रमशः)

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