मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ३६/३९

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*॥ सुंदरि विलाप॥* 
*दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ ।* 
*सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥३६॥* 
जैसे कुरूप और कुकुल में पैदा होने वाली पतिव्रता स्त्री पति की सेवा से पति की प्रिय बन जाती है और साध्वी कहलाती है । क्योंकि सेवा में रूप और कुल की आवश्यकता नहीं होती, सेवा तो भावप्रधान होती है । ऐसे ही नीच कुल में पैदा होने वाला भक्त सेवा के द्वारा प्रभु प्रिय हो जाता है । प्रभुरूप कुल, धन आदि से प्रसन्न नहीं होते किन्तु केवल भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं । लिखा है कि व्याध का कोई आचरण अच्छा नहीं था । ध्रुव कोई बहुत बड़ी आयु वाला नहीं था । गजेन्द्र कोई पढ़ा लिखा नहीं था । कुब्जा का कोई सुन्दर रूप नहीं था । सुदामा के पास कोई धन नहीं था, वह तो बिलकुल निर्धन था । विदुर जी कोई उच्च जाति के नहीं थे । उग्रसेन जो यादवों का राजा था वह कोई बलशाली नहीं था । ये सब भगवान् के प्रेमी भक्त थे इसलिये इन पर भगवान् प्रसन्न थे क्योंकि भगवान् को केवल प्रेम भक्ति ही प्यारी है । 
*दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार ।*
*सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥३७॥* 
हे प्रभो, मैं तो शील-संतोषभावभक्ति साधनों से आप की ही सेवा करता हूँ और अपना तन मन सब कुछ आपको समर्पित कर दिया है । फिर भी आप मेरे से दूर दूर कैसे भाग रहे हैं? प्रसन्न हो जाइये । मैं आपको कभी नहीं छोड़ सकता हूँ । मैं तो आपका ही हूँ, आपके सिवा मेरा दूसरा कोई भी नहीं है । ऐसा भाव पतिव्रता भक्तों का हुआ करता है ।
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*पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि ।* 
*अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥३८॥* 
पतिसेवापरायण भार्या की तरह निष्काम भक्त सब प्राणियों में स्थित परमात्मा को पहचान कर देवताओं को भी आत्मभाव से ही पूजता है । देवत्व भावना से नहीं, क्योंकि उसकी भेदबुद्धि निवृत्त हो गई है और एक आत्मा में ही निष्ठ रहता है । यास्कसूत्र में लिखा है कि- 
जितने भी देवी देवता हैं वे सब उसी परमात्मा के ही अंग प्रत्यंग है । एक दिन ही सब भूतों में गूढ हैं । एक का ही विद्वान् ब्राह्मण अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं । सायणाचार्य लिखते हैं कि सभी परमात्मा का ही पूजन करते हैं । क्योंकि सब में वह आत्मा स्थित है । 
*आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार ।* 
*हूँ अबला समझूं नहीं, तूं जानै करतार ॥३९॥* 
हे सृष्टि के बनाने वाले परमेश्वर ! मेरी दृष्टि में तो सारे संसार के प्राणी बहिन के तुल्य हैं । अतः वे मेरे उपास्य नहीं हैं । मेरा स्वामी तो एक परमपुरुषोतम भगवान् ही है । अतः मैं आपकी ही उपासना करता हूँ । मैं तो साधनहीन होने से अबला हूँ । भक्त का साधन ही बल होता है? मैं नहीं जानता कि आपके पास में आने के लिये क्या साधन होता है? अतः आप ही साधन द्वारा आपके पास बुलाकर सामीप्यादि मुक्ति प्रदान करें ।
(क्रमशः)

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