सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

सुमति कुमति का अंग १०४*(५/८)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जीव जन्म जाणै नहीं, पलक पलक में होइ ।*
*चौरासी लख भोगवै, दादू लखै न कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*सुमति कुमति का अंग १०४*
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रज्जब बंटा१ भाव का, गुण अवगुण सु खिलार२ । 
एकहुं जीत्यों स्वर्ग है, एकहुं नरक विहार३ ॥५॥ 
जैसे खेल की भूमि का विभाग१ करके खिलाड़ी खेलते हैं । वैसे ही सुभाव-कुभाव का विभाग करके गुण-अवगुण रूप खिलाड़ी२ खेल रहे हैं, एक गुण पक्ष के जीतने से तो स्वर्ग मिलता है और अवगुण पक्ष के जीतने से नरक निवास३ मिलता है ।
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आदम१ ईदम२ औलिया६, आदम ईदम होय ।
सूरो श्वान मनिष३ सही४, रज्जब लक्षण जोय५ ॥६॥
यदि लक्षणों का विचार करके देखें५ तो यह२ मानव१ ही संत६ होता है और यह संत ही मानव होता है, शूरवीर, श्वान, आदि भी निश्चय४ मनुष्य३ ही होता है अर्थात जिस समय जिसका लक्षण मनुष्य में दिखाई दे उस समय वह उसी का रूप होता है ।
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रज्जब दास भाव सुत सुमति का, मोहे आतम राम ।
कुमति कूखि१ अभिमान ह्वै, मा बेटे बेकाम ॥७॥
दास भाव सुमिति का पुत्र है, इसने आत्म स्वरूप राम को भी मोहित किया है, कुमति के पेट१ से अभिमान उत्पन्न होता है और ये दोनों मा बेटे निकम्मे हैं, इनसे मानव कल्याण का काम नहीं होता, उलटे बंधन डालते हैं ।
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पंच तत्त्व सौं धर्म ह्वै, पंच तत्त्व सौं कर्म ।
बरतणि१ ज्ञान अज्ञान की, रज्जब लह्या मर्म२ ॥८॥
पंच तत्त्वों से रचित शरीर अन्त:करणादि से ही सुकर्म रूप धर्म होता है और उन्हीं से कुकर्म होता है । धर्म रूप व्यवहार१ सुमति रूप ज्ञान का है । कुकर्म रूप व्यवहार कुमति रूप अज्ञान का है । यह रहस्य२ हमने जान लिया है । 
(क्रमशः)

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