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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग)
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*मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।*
*निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥२७॥*
पल पल में मन से ब्रह्म का मनन, चित्त से चिन्तन सर्वत्र निष्काम भाव से भाव भक्ति द्वारा नेत्रों से उनका दर्शन साधु को करना चाहिये । क्षणमात्र भी उपराम को प्राप्त न हो । वही साधु जीवन है । लिखा है कि-
आलस्य को छोड़ कर एक मुहूर्त भी जो नारायण का ध्यान करता है, वह भी सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, जो दिन रात ही उसके भजन में तत्पर रहता है उसके विषय में तो कहना ही क्या है ।
वह सबसे बड़ी बात है वह ही महान् छिद्र है, वह ही मोह है और वह ही विभ्रम जो क्षण या मुहूर्त भी भगवान् का स्मरण नहीं करता ।
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*॥कथनी बिना करणी॥*
*जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज ।*
*निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥२८॥*
लोक में जिसको भक्त नाम से कहते हैं और स्वयं भी अपने को भक्त मानता है । उसके हृदय में भक्ति अवश्य होनी चाहिये और राम की आज्ञा का पालन करना चाहिये और अपनी भक्ति को किसी के आगे कहना नहीं चाहिये न अहंकार करना चाहिये । ऐसा करने से वह शुद्ध अन्तःकरण वाला होकर भक्ति के फल को प्राप्त कर लेता है, अन्यथा नहीं । यहां पर नीति शब्द से धर्माचरण और इन्द्रियनिग्रह समझाना राम राज से, राम नाम चिन्तन जानना केवल भक्त का नाम धराने मात्र से भक्त नहीं होता किन्तु भक्त तो भक्ति करने से माना जाता है । ब्रह्म का ध्यान करने से मन निर्विकार होकर ब्रह्मरूप हो जाता है ।
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*॥सुन्दरि विलाप॥*
*जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार ।*
*दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥२९॥*
परमात्मा इस सृष्टि को बनाकर स्वयं ही जीव बनकर प्रविष्ट हो गया । इन श्रुतियों से यह सिद्ध होता है कि इस शरीर को परमात्मा ने ही धारण कर रखा है । अन्यथा जीव के बिना यह शरीर मृतक बन जाता है । अतः इस शरीर में उसकी सत्ता से ही वह सत्ता वाला बना हुआ है । उसके सौंदर्य से ही यह सुन्दर लगता है । अतः जीव को सुन्दर से सुन्दर उस परमात्मा का ही ध्यान करना चाहिये । जैसे नारी की शोभा पति से ही मानी जाती है । पति विना विधवा कहलाती है । ऐसे भक्त की भी शोभा भक्ति से ही है, और स्त्री अपने पति के लिये ही श्रृंगार करती है वैसे भक्त भी शान्ति दान्ति तितिक्षा आदि से अपने मन का श्रृंगार केवल भगवान् की प्रसन्नता के लिये ही करता है ।
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*दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव ।*
*सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥३०॥*
*यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ ।*
*दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥३१॥*
जैसे पतिव्रता नारी पति को प्रसन्न करने के लिये पांच भूषण और सोलह श्रृंगार धारण करती है । ऐसे भक्त भी पांच ज्ञानेन्द्रिय जो भूषण धारण करने का स्थान मानी गई हैं । इन को ज्ञान, ध्यान, धारणा, शान्ति, तितिक्षा, आदि भूषण धारण करवा के अलंकृत करे और उन से परमात्मा रूप पति की सका करे । तब जैसी पतिव्रता नारी को सौभाग्य प्राप्त होता है ऐसे भक्त भी भगवत् प्रिय बन जाता है और मुक्त हो जाता है । श्रृंगार करने वाले गुण शास्त्रों में वर्णित है । जैसे शान्ति, दान्ति, तितिक्षा, क्षमा, दया, निवृत्ति, उदारता, निर्मलता, निश्चलता, निर्भयता, समता, निरहंकारता, मित्रता, सदा आनंदता, आदि गुण है । भागवत के पंचम स्कन्ध में-कुछ परमात्मा को परमात्मा को प्रसन्न करने के गुण बतलाये हैं- जैसे हँसस्वरूप गुरु की सेवा में तत्परता, तृष्णा का त्याग, द्वन्दों की तितिक्षा, सर्वत्र लोकान्तरों में भी दुःखों का अनुसंधान करना, जिज्ञासा तप, काम्य कर्मों का त्याग, मेरे लिये कर्म करना, मेरी कथा सुनना, मेरे को ही देव समझना मेरे गुणों का कीर्तन करना, निर्वैर होना, समता, प्राप्त करना, देह और गेह में अहंकार का त्याग, आत्मशास्त्र का अभ्यास, कर्तव्य कर्म का कभी त्याग न करना, एकान्त में रहना, प्राण इन्द्रिय, मन को जीतना, सत्पुरुषों में श्रद्धा, ब्रह्मचर्य का पालन और सदा प्रमाद से दूर रहना सर्वत्र मेरी भावना करना अनुभवपर्यन्त ज्ञानविज्ञान के द्वारा धैर्य और विवेक से अहंकार को त्यागना। इन सब साधनों से गृहस्थ आश्रम से उपराम होकर मेरे को प्राप्त हो जावोगे।
(क्रमशः)

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