रविवार, 16 फ़रवरी 2020

*भिन्न भिन्न धर्मों में एकता की दृष्टि*

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*निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं,*
*आन न दूजा भाव धरैं ।*
*सहजैं सदा राम रंग राते,*
*मुक्ति वैकुंठैं कहा करैं ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २७२)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मथुरबाबू तथा उनकी पत्नी जगदम्बा दासी के साथ वे एक बार वाराणसी, प्रयाग तथा वृन्दावन भी गये थे । उस समय हृदयराम भी साथ में थे । वाराणसी में उन्होंने मणिकर्णिका में समाधिस्थ होकर भगवान् शंकर के दर्शन किये और मौनव्रतधारी त्रैलंग स्वामी से भेंट की । मथुरा में तो उन्होंने साक्षात् भगवान् आनन्दकंद, सच्चिदानन्द, अन्तर्यामी श्रीकृष्ण के दर्शन किये । उच्च भावदशा रही होगी ।
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‘सेस, महेस, गनेस, दिनेस,
सुरेशहुँ जाहि निरन्तर गावें,
जाहि, अनादि, अनन्त, अखण्ड,
अछेद्, अभेद सुवेद बतावें ।’
(-श्रीरसखानि)
उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण को उन्होंने यमुना पार करते हुए गौओं को गोधूली समय वापस लाते देखा और ध्रुवघाट पर से वसुदेव की गोद में भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किये । श्रीरामकृष्ण तो कभी कभी समाधिस्थ हो कहते थे, ‘जो राम थे और जी कृष्ण थे वही अब रामकृष्ण होकर आये हैं ।’
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सन १८७९-८० में श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त उनके पास आने लगे थे । उस समय उनकी उन्माद-अवस्था प्रायः चली-सी गयी थी और अब शान्त, सदानंद और समाधि की अवस्था थी । बहुधा वे समाधिस्थ रहते थे और समाधि भंग होने पर भावराज्य में विचरण किया करते थे ।
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शिष्यों में उनके मुख्य शिष्य नरेंद्र(बाद में स्वामी विवेकानन्द) थे । जब से श्री नरेन्द्र उनके पास आने लगे थे तभी से उन्हें नरेन्द्र के प्रति एक विशेष प्रेम हो गया था और वे कहते थे कि नरेन्द्र साधारण जीव नहीं है । कभी कभी तो नरेन्द्र के न आने से उन्हें व्याकुलता होती थी; क्योंकि वे यह अवश्य जानते रहे होंगे कि उनका कार्य भविष्य में मुख्यतः नरेन्द्र द्वारा ही संचालित होगा ।
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अन्य भक्तगण राखाल, भवनाथ, बलराम मास्टर महाशय आदि थे । ये भक्तगण १८८२ के लगभग आये और इसके उपरान्त दो-तीन वर्ष तक अनेक अन्य भक्त भी आये । इन सब भक्तों ने श्रीरामकृष्ण तथा उनके कार्य के लिये अपना जीवन अर्पित किये थे ।
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ईश्वरचंद्र विद्यासागर, डाँ. महेन्द्रलाल सरकार, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, अमेरिका के कुक साहब, पं. पद्मलोचन तथा आर्यसमाज के प्रवर्तक श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी उनके दर्शन किये थे । ब्राह्मसमाज के अनेक लोग उनके पास आया जाया करते थे । श्रीरामकृष्ण केशवचन्द्र सेन के ब्राह्ममंदिर में भी गये थे ।
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श्रीरामकृष्ण ने अन्य धर्मों की भी साधनाएँ कीं । उन्होंने कुछ दिनों तक इस्लाम धर्म का पालन किया और ‘अल्लाह’ मन्त्र का जप करते करते उन्होंने उस धर्म का अन्तिम ध्येय प्राप्त कर लिया । इसी प्रकार उसके उपरान्त उन्होंने ईसाई धर्म की साधना की और ईसामसीह के दर्शन किये ।
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जिन दिनों वे जिस धर्म की साधना में लगे रहते थे, उन दिनों उसी धर्म के अनुसार रहते, खाते, पीते, बैठते-उठते तथा बात-चीत करते थे । इन सब साधनाओं से उन्होंने यह दिखा दिया कि सब धर्म अन्त में एक ही ध्येय में पहुँचते हैं । और उनमें आपस में विरोध-भाव रखना मूर्खता है । ऐसा महान् कार्य करनेवाले ईश्वरी अवतार श्रीरामकृष्ण ही थे ।
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इस प्रकार ईश्वरप्राप्ति के लिये कामिनी-कांचन का सर्वथा त्याग तथा *भिन्न भिन्न धर्मों में एकता की दृष्टि* रखना इन्होंने अपने सभी भक्तों को सिखाया और उनसे उनका अभ्यास कराया । इनके कतिपय शिष्य आगे चलकर भारतवर्ष के अतिरिक्त अमेरिका आदि अन्य देशों में भी गये और वहाँ उन्होंने श्रीरामकृष्ण के उपदेशों का प्रचार किया ।
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१५ अगस्त सन् १८८६ की रात को गले के रोग से पीड़ित हो श्रीरामकृष्ण ने महासमाधि ले ली; परन्तु महासमाधि में गया केवल उनका पांचभौतिक शरीर । उनके उपदेश आज संसार भर में श्रीरामकृष्ण मिशन के द्वारा कोने कोने में गूँज रहे हैं और उनसे असंख्य जनों का कल्याण हो रहा है ।
-विद्याभास्कर शुक्ल

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