🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कै यहु तुम को खेल पियारा,*
*कै यहु भावै कीन्ह पसारा ॥*
*यहु सब दादू अकथ कहानी,*
*कहि समझावो सारंग-पाणी ॥*
====================
साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
.
*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
.
*१९. निमाई का अध्ययन के लिये आग्रह*
.
विद्यानाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
धेनुः कामदुघा रतिश्य विरहे नेत्रं तृतीयं च सा।
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणं
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु॥[१]
([१] विद्या मनुष्य की अतुलनीय कीर्तिस्वरूपा है, भाग्य क्षय होने पर विद्या ही एकमात्र आश्रयदात्री है। विद्या सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु है, विरह में रति है और मनुष्य के तृतीय नेत्र के समान है। विद्या सत्कार की खानि, कुल की महिमा को बढ़ाने वाली और बिना ही रत्नों के सर्वोत्तम भूषण है। इसलिये सम्पूर्ण विषयों की उपेक्षा करके एक विद्या में ही अधिकार करने का प्रयत्न करना चाहिये। भर्तृ. नी. श. २०)
.
पुत्र-स्नेह भी संसार में कितनी विलक्षण वस्तु है? जिस समय माता-पिता का ममत्व पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है, उस समय वे कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान को खो बैठते हैं। बड़े-बड़े पण्डित भी पुत्र-स्नेह के कारण अपने कर्तव्य से च्युत होते हुए देखे गये हैं। भगवान की माया ही विचित्र है, उसका असर मूर्ख-पण्डित सभी पर समानरूप से पड़ता है।
.
पण्डित जगन्नाथ मिश्र स्वयं अच्छे विद्वान थे, कुलीन ब्राह्मण थे, विद्या के महत्त्व को जानते थे, किन्तु विश्वरूप से विछोह से वे अपने कर्तव्य को खो बैठे। सर्वगुण सम्पन्न पुत्र के असमय में धोखा देकर चले जाने के कारण उनके हृदय पर एक भारी चोट लगी। वे इस विछोह का मूल कारण विद्या को ही समझने लगे।
.
उनके हृदय में बार-बार यह प्रश्न उठता था- ‘यदि विश्वरूप इतना अध्ययन न करता, यदि मैं उसे इस प्रकार सर्वदा पढ़ते रहने की छूट न देता, तो सम्भव है मुझे आज यह दिन न देखना पड़ता। इसलिये इनके मन में आया कि अब निमाई को अधिक पढ़ाना-लिखाना नहीं चाहिये। हाय रे ! मोह ! इधर अब तक तो निमाई कुछ पढ़ते ही लिखते न थे।
.
दिनभर बालकों के साथ उपद्रव मचाते रहना ही इनका प्रधान कार्य था, किन्तु विश्वरूप के गृह त्याग ने के अनन्तर इनका स्वभाव एकदम बदल गया। अब इन्होंने उपद्रव करना बिलकुल छोड़ दिया। अब ये खूब मन लगाकर पढ़ने लगे। दिनभर खूब परिश्रम के साथ पढ़ते और खेलने-कूदने कहीं भी न जाते। माता-पिता के साथ भी अब ये सौम्यता का बर्ताव करने लगे।
.
इस एकदम स्वभाव-परिवर्तन का पिता के ऊपर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। वे सोचने लगे- ‘मुझे जो भय था वही सामने आ उपस्थित हुआ। निमाई भी अब विश्वरूप की भाँति अध्ययन में संलग्न हो गया। इसकी बुद्धि उससे कम तीव्र नहीं है। एक ही दिन में इसने सम्पूर्ण वर्णों की जानकारी कर ली थी, यदि इसे भी अध्ययन के लिये विश्वरूप की भाँति स्वतन्त्रता दे दी जाय तो यह भी हमारे हाथ से जाता रहेगा।
.
यह सोचकर उन्होंने एक दिन निमाई को बुलाया और बड़े प्यार से कहने लगे- ‘बेटा ! मैं तुमसे एक बात कहता हूँ, तुम्हें मेरी वह बात चाहे उचित हो या अनुचित माननी ही पड़ेगी।’ निमाई ने नम्रतापूर्वक कहा- ‘पिताजी ! आप आज्ञा कीजिये। भला, मैं कभी आपकी आज्ञा को टाल सकता हूँ ! आपके कहने से मैं सब कुछ कर सकता हूँ।’
.
मिश्र जी ने कहा- ‘हम तुम्हें अपनी शपथ दिलाकर कहते हैं, तुम आज से पढ़ना बंद कर दो। हमारी यही इच्छा है कि तुम पढ़ने-लिखने में विशेष प्रयत्न न करो।’ जिस दिन से विश्वरूप गृह त्यागकर चले गये थे, उस दिन से निमाई माता-पिता की आज्ञा को कभी नहीं टालते थे। पिता की बात सुनकर इन्होंने नीचे सिर झुकाये हुए ही धीरे से कहा- ‘जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा।’
.
इतना कहकर ये भीतर माता के पास चले गये और पिता की आज्ञा माता को सुना दी। दूसरे दिन से इन्होंने पढ़ना-लिखना बिलकुल बंद कर दिया। अब इन्होंने अपनी वही पुरानी चंचलता फिर आरम्भ कर दी। लड़कों के साथ गंगा जी के घाटों पर जाते, घण्टों जल में ही स्नान करते रहते। कभी अपने साथियों को लेकर लोगों के ऊपर पानी उलीचते।
.
स्त्रियों के पास चले जाते, छोटे-छोटे बच्चों को रुला देते। स्त्रियों के सूखे वस्त्रों को जल में फेंककर भाग जाते। किसी की घाट पर रखी हुई नैवेद्य को बिना उसके पूछे ही जल्दी से चट कर जाते। कोई आकर डाँटने लगता तो बड़े जोरों के साथ रोने लगते, सभी बालक इनके चारों ओर खडे़ हो जाते, आस-पास से और भी लोग इकट्ठे हो जाते।
.
कोई तो उस डाँटने वाले को बुरा-भला कहता। कोई इन्हें शान्त करने की चेष्टा करता। बहुत-से कहते- ‘अजी ! कोई कहाँ तक सहन करे, यह लड़का है भी बड़ा उपद्रवी, किसी की सुनता ही नहीं।’ इस प्रकार लोग नित्य-प्रति जा-जाकर मिश्र जी से शिकायत करते। मिश्र जी इन्हें पुचकारकर कहते- ‘बेटा ! इतना दंगल नहीं करना चाहिये।’ आप धीरे से कहते- ‘तब हम करें क्या? जब पढ़ने न जायँगे तो बालकों के साथ खेल ही करेंगे। हमसे चुपचाप घर में तो बैठा नहीं जाता।’ पिता इनका ऐसा उत्तर सुनकर चुप हो जाते। ये भाँति-भाँति के खेल खेलने लगे।
.
एक दिन आपने बहुत ही फटे-पुराने कपड़े पहन लिये, आँखों में पट्टी बाँध ली और एक लड़के का कंधा पकड़कर घर-घर भीख माँगने लगे। बहुत-से लड़के इनके साथ ताली बजा-बजाकर हँसते जाते थे। ये घरों में जाते और स्त्रियों से कहते- ‘माई ! अन्धे को भीख डालना, भगवान तेरा भला करेंगे।’ स्त्रियाँ इनकी ऐसी क्रीड़ा देखकर खूब जोरों से हँसने लगतीं और इन्हें कुछ खाने की चीजें दे देतीं। ये उसे अपने साथियों में बाँटकर खा लेते और फिर दूसरे घर में जाते। इस प्रकार ये अपने घर भी गये।
.
शचीमाता भोजन बना रही थी। आपने आवाज दी- ‘मैया ! भगवान् तेरा भला करे, दूध-पूत सदा फलते-फूलते रहें, इस अन्धे को थोड़ी भीख डाल देना।’ माता निकलकर बाहर आयीं और इनका ऐसा रूप देखकर आश्चर्य के साथ कहने लगीं- ‘निमाई ! तू कैसे होता जा रहा है, भला, ब्राह्मण के बालक को ऐसा रूप बनाना चाहिये। तू घर-घर से भीख माँग रहा है, तेरे घर में क्या कमी है? ऐसा खेल ठीक नहीं होता।’
.
आपने उसी समय पट्टी खोलकर कहा- ‘अम्मा ! निर्धन ब्राह्मण का मूर्ख बालक अन्धा ही है, वह भीख माँगने के सिवा और कर ही क्या सकता है? मुझे पढ़ावेगी नहीं तो मुझे भीख ही तो माँगनी पड़ेगी।’ इनकी बात सुनकर शचीदेवी की आँखों में मारे प्रेम के आँसू आ गये, उन्होंने इन्हें जल्दी से गोद में लेकर पुचकारा। साथ के बच्चों को थोड़ी-थोड़ी मिठाई देकर बिदा किया और इन्हें स्नान कराके भोजन कराने लगी। ये जान-बूझकर उपद्रव करने लगे।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें