बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १४९/१५२*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १४९/१५२*
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*हेत आभास* प्रकास हरि, रांम तुमहि *छल जाति* ।
कहि जगजीवन *निग्रहस्थान*, दीप ग्यांन बुद्धि बाति ॥१४९॥
संत कहते हैं कि मोहवश असत्य में सत्य का आभास होता है । हे प्रभु, जीव इससे भ्रमित होते हैं । पूजा के स्थान पर तो ज्ञान के दीपक व बुद्धि की बाती से ही प्रकाश की सम्भावना है ।
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श्रेये ग्यांन सथान हरि, *न्याय सूत्र* है नांम ।
कहि जगजीवन *षोडस पदारथ*, सम्यक समझै रांम ॥१५०॥
संत कहते हैं कि ज्ञान का श्रेयस स्थान स्वयं आप हैं और प्रभु नाम ही न्याय सूत्र है । कहते हैं कि सृष्टि का विधान न्याय सूत्र से चलता है जो सोलह कलाओं द्वारा सोलह पदार्थ देनेवाला है अतः सभी जीव निष्कर्षतः नाम को ही सर्वोपरि जानें ।
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सतगुरु तुम्हरे सबद मंहि, सकल बसत१ भरपूरि ।
कहि जगजीवनदास कौं, जिनि भरमावौ दूरि ॥१५१॥
संत जगजीवन दास जी कहते है कि हे सतगुरु आपके शब्दॊं में सब कुछ मिलता है । संत कहते हैं कि अब हमें अन्य बातों से न भरमावैं । हमें गुरु में पूर्ण विश्वास है ।
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सतगुरु भगति सिष्य हरि, कीजै जन बितपन२ ।
कहि जगजीवन रांमजी, प्रेम प्रकाशौ तिन ॥१५२॥
संत कहते है बुद्धिमान शिष्य हरि भक्ति में लीन रहता है । जगजीवन जी महाराज कहते हैं उन पर प्रभु प्रेम की वर्षा होती है ।
(क्रमशः)

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