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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १४५/१४८*
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अबिगति अलख अगाध निरंजन, सतगुरु सुमिरन ध्यांन ।
कहि जगजीवन गुरु कह्या, यहु अनभै यहु ग्यांन ॥१४५॥
संत जगजीवनदास जी महाराज कहते हैं कि वे उस गति से परे दृष्टि से परे सीमा से परे निरंजन देव का ध्यान करते हैं यह आदेश गुरु महाराज के अनुभव ज्ञान से मिला है ।
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सतगुरु२ *सबद प्रमाण* करि, *प्रमेय* रांम निवास ।
*संसै* नासै *प्रयोजन*, सु कहि जगजीवनदास ॥१४६॥
संत कहते हैं कि सद्गुरु महाराज के शब्द ही प्रमाण हैं उन्हें आबद्ध नहीं किया जा सकता व हर स्थान पर प्रभु की उप स्थिति का आभास करें । शब्दों की यही सार्थकता है जिससे सब सन्देह दूर होंगे ऐसा संत कहते हैं ।
(२. यहां १४६ से १५० तक की साखियों से पण्डितश्री जगजीवनदास जी ने न्यायशास्त्र में वर्णित १६ पदार्थों का समन्वय भक्तिशास्त्र में कर दिया है । *न्यायशास्त्र* में वर्णित १६ पदार्थ ये हैं – १. प्रमाण, २. प्रमेय, ३. संशय, ४. प्रयोजन, ५. दृष्टांत, ६. सिद्धान्त, ७. (वाक्य के पांच)अवयव, ८. तर्क, ९. निर्णय, १०. वाद, ११. जल्प, १२. वितण्डा, १३. हेत्वाभास, १४. छल, १५. जाति तथा १६. निग्रहस्थान । इनके तत्वज्ञान से निःश्रेयस(मोक्ष) प्राप्त होता है । (इनका विस्तृत विवरण गौतम प्रणीत *न्यायदर्शन* के प्रथम अध्याय के प्रथम सूत्र में दिया गया है । जिज्ञासु को वहीं देखना चाहिये ।)
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*द्रिष्टान्त* देख्या कहै, *सिद्धान्त* हरि जांणि ।
कहि जगजीवन *अवयव* वृद्धि, रांम ह्रिदा मंहि आंणि ॥१४७॥
संत कहते हैं कि दृष्टांत देखे को कहते हैं किन्तु सत्य व प्रमाणित सिद्धांत होता है । वह सत्य ही प्रभु है । संत कहते हैं कि ईश्वर चिन्तन से व्यक्तित्व का विकास होता है यह सुन्दर बात संत जगजीवन दास जी कहते हैं ।
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*निरणय* बरण बिलास हरि, अक्षर अक्षर वाद ।
कहि जगजीवन *जलपि वित*, भगति प्रेम रस स्वाद ॥१४८॥
संत कहते हैं कि लोकमत, रंग, ऐश्वर्य व शब्द शब्द पर अर्थ सबंधी विवाद ये सब समुद्र के समान बढाकर व्यर्थ प्रलाप हो रहे हैं अतः इस सामर्थ्य को छोड़कर कि मुझे कितना उपलब्ध है, जीव को भक्ति में प्रेम रस को जान कर उसका आस्वादन करना चाहिये ।
(क्रमशः)

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