बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १५३/१५६*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १५३/१५६*
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चहिन चैन३ त्यागै सकल, सुध बुधि हरि गुन गाइ ।
जगजीवन गुरु की क्रिपा, सतगुरु परसै ताहि ॥१५३॥
संत कहते हैं कि सभी वासनाओं का त्याग कर होश व बुद्धि से जो प्रभु गुण गाते हैं, गुरु कृपा से वे जन सतगुरु महाराज की कृपा के पात्र होते हैं ।
(३. चाहिन चैन-वासनामय सुख)
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गुरु कूं पीठ न दीजिये, सन्मुख मिलिये आय ।
अघ नासै आनंद बधै, जगजीवन जस४ गाय ॥१५४॥
संत कहते हैं कि कभी भी गुरु महाराज की और पीठ न करे उनके सन्मुख रहें उनकी आज्ञा का पालन करने से पाप का नाश होता है व आनंद की वृद्धि होती है । (४. जस-यश{कीर्ति = गुणानुवाद})
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दिल मंहि दाग अनंग५ का, कहु क्यौं छूटै रांम ।
कहि जगजीवन प्रेम जल, सतगुरु साबू६ नांम ॥१५५॥
संत जगजीवन जी महाराज कहते हैं कि मन में स्थित वासनाओं के दाग को प्रेम रुपी जल व नाम स्मरण के साबुन से ही धोया जा सकता है ।
(५. दाग अनंग-कामवासना का कलंक) (६. साबू-राम नाम का साबुन)
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सोहं हंसा७ हंस हरि, सतगुरु परस्यां होइ ।
कहि जगजीवन सौंज सब, सहजि समावे सोइ ॥१५६॥
संत कहते हैं कि जीव रुपी हंस सतगुरु के सानिध्य से अनहद ध्वनि सोहम् हो जाता है । संत कहते है जो इस मार्ग के लिये तैयार हैं वे सहज ही उसकी कृपा में समा जाते हैं । (७. सोहं हंसा-साधना द्वारा श्वास की गति को ‘हंसो’ से ‘सोहं’ में परिवर्तित करना)
(क्रमशः)

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