मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १२१/१२४*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १२१/१२४*
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सुन्य निरंजन सबद निरंजन, सहजि निरंजन सारा ।
कहि जगजीवन तहँ गुरु दादू, आतम रांम विचारा१ ॥१२१॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि प्रभु की स्थिति शून्य में है वे निर्लिप्त हैं प्रभु की ध्वनि भी प्रणवाक्षर ओम है वह सहज है । अतः संत कहते हैं कि बिना किसी आडंबर व यत्न के जहां सहजता से गम्यता हो पहुंचा जा सके वहीं दादू जी महाराज ने अपना स्थान विचारा है ।
(१-१. साखी क्र. १२०/१२१ दोनों साखी महात्मा जगजीवनजी के नाम से दादूपंथ में बहुत प्रसिद्ध हैं)
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दादू को दीरघ२ भजन, सब थैं स्रेसठ३ सोइ ।
कहि जगजीवन मंडले४, निज जन चिन्है कोइ ॥१२२॥
संत कहते हैं कि दादू जी महाराज लंबे समय तक भजन ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं । अलग अलग समूहों में, मंडलियों में ऐसे भजनीक ही हमारे निज जन हैं ।
(२. दीरघ-चिरकाल तक का) (३. स्रेसठ-श्रेष्ठ = उत्तम)
{४. मंडले-मण्डली(साधु-सन्तों का समूह)}
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कहि जगजीवन रूंखडे५, रांम पुराने पात ।
सतगुरु सींचैं ते हरे, जग मंहि लागी जात ॥१२३॥
संत कहते हैं कि जीव वृक्ष है जिसमें राम नाम के बड़े प्राचीन पत्ते लगे हैं । वे यदि गुरु महाराज की सद्शिक्षा रुपी वचनों से पोषित होंगे तो हरे भरे हो जायेंगे पर संसार के अनुसार चले तो दागी हो जायेंगे ।
(५. रूंखड़े-रूखे सूखे वृक्ष)
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रांम नांम मिलि ऊचरै, गुरु सिष एक समीप ।
कहि जगजीवन मांनिये, नौ खण्ड सातौं द्वीप६ ॥१२४॥
संत कहते हैं कि गुरु की रामनाम की शिक्षा को शिष्य गुरु के समीप बैठ कर स्मरण करें(गुरुदेव को हृदयस्थ कर के करें) जो कि ब्रह्मांड के सप्त द्वीप व नव खण्डों में सर्वत्र मान्य है वही सर्वोत्तम सत्य साधना है ।
(६. सातौं द्वीप- १.जम्बु द्वीप, २.शाक द्वीप, ३.सूक्ष्म द्वीप, ४.क्रौंच द्वीप, ५.गोमय द्वीप, ६.श्वेत द्वीप एवं ७.प्लक्ष द्वीप)
(क्रमशः)

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