मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १२५/१२८*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १२५/१२८*
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यों कलि कोई न निवाजै७, ज्यों गुरु किये सनाथ ।
कहि जगजीवन जे नां हुते, जग मंहि जीव अनाथ ॥१२५॥
संत जगजीवन जी महाराज कहते हैं कि इस कलियुग में गुरु महाराज के सामान कोइ भी सनाथ करने की दया नहीं करते हैं । जैसे गुरु महाराज ने दया कर शरण में रखा है अगर गुरु महाराज न होते तो जग में यह जीव अनाथ जैसा ही होता ।
(७. निवाजै - दया करने वाला)
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कहि जगजीवन कोइ दिन, कस८ करि कस्या सरीर८ ।
पीछै पोष्या९ परम गुरु, प्रेम पिलाया नीर ॥१२६॥
संत कहते हैं कि गुरु महाराज ने जीव उद्धार हेतु इस देह को खूब कसा, कष्टों का सामना करवाया । उसके बाद दया करके पोषण स्वरूप प्रेम रुपी जल का पान करवाया । गुरु हमारे सुधार के लिये ही कठोर व्यवहार करते हैं किंतु अंतसः में प्रीत रखते हैं ।
(८-८. कस करि कस्य शरीर-शरीर पर कठोर नियंत्रण किया)(९. पोष्या-पालन पोषण किया)
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दरखत१० विरख सबज हरे, वर ग्यांन गुरु ग्यांन ।
कहि जगजीवन आब जल, सुखद सबद अन्नदांन ॥१२७॥
संत कहते हैं कि गुरु कृपा से सभी जीव हरेभरे वृक्षों के समान ज्ञान से फलित होते हैं । जल जैसे पौधों का पोषण करता है व अन्नदान जैसे मनुष्य का पोषण करता है, उसी प्रकार गुरु के शब्द जीव का पोषण करते हैं ।
(१०. दरखत-हरा{फूला-फला} वृक्ष)
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पवन थंभि मन थंभि मंहि, जोति जगावै नांम ।
कहि जगजीवन भगति करि, राखि हृदै रस नांम ॥१२८॥
संत कहते हैं कि सांसों को संयत कर मन को संयत करके किया हुआ प्रभु का नाम जप, हृदय में आत्म ज्योति जगा देता है । संत कहते हैं कि भक्ति करने से मन नाम रुपी रस से सराबोर रहता है ।
(क्रमशः)

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