🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*मैं मेरे में हेरा,*
*मध्य मांहिं पीव नेरा ॥टेक॥*
*जहाँ अगम अनूप अवासा,*
*तहँ महापुरुष का वासा ।*
*तहँ जानेगा जन कोई,*
*हरि मांहि समाना सोई ॥१॥*
*अखंड ज्योति जहँ जागै,*
*तहँ राम नाम ल्यौ लागै ।*
*तहँ राम रहै भरपूरा,*
*हरि संग रहै नहिं दूरा ॥२॥*
*तिरवेणी तट तीरा,*
*तहँ अमर अमोलक हीरा ।*
*उस हीरे सौं मन लागा,*
*तब भरम गया भय भागा ॥३॥*
*दादू देख हरि पावा,*
*हरि सहजैं संग लखावा ।*
*पूरण परम निधाना,*
*निज निरखत हौं भगवाना ॥४॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. ७८)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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बास बासंत तहां प्रगटया षेलं ।
द्वादस अंगुल गगन धरि मेलं ।
बदंत गोरष पूतां होइबा चिराई ।
न पडंत काया न जम धरि जाई ॥११६॥
जहां ब्रह्म के निवास की दिव्य सुगंध विद्यमान है वहां दिव्य ज्योति की लीला अनवरत चल रही है । योगी जन नासिका से बाहर वायु की गति बारह अंगुल तक मानते हैं, प्राण -संयम के द्वारा इसकी गति को न्यून कर भीतर ही समाहित कर ब्रह्मरंध्र गामी हो जाने पर गोरख कहते हैं कि योगी चिरायु हो जाता है, उसकी काया अमरता को प्राप्त होती है वहां यम(मृत्यु) का प्रवेश नहीं हो पाता है ।
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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