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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२०० - अत्यन्त निर्मल उपदेश । दादरा
चल रे मन ! जहां अमृत वनाँ,
निर्मल नीके सँत जनाँ ॥टेक॥
निर्गुण नाँव फल अगम अपार,
सँतन जीवन प्राण अधार ॥१॥
सीतल छाया सुखी सरीर,
चरण सरोवर निर्मल नीर ॥२॥
सुफल सदा फल बारह मास,
नाना वाणी धुनि प्रकाश ॥३॥
तहां बासे बसे अमर अनेक,
तहँ चलि दादू इहै विवेक ॥४॥
२०० - २०१ में अत्यन्त निर्मल उपदेश कर रहे हैं - अरे मन ! जहां सत्संग रूप अमृत वन है, वहां ही चल, उस वन में परम निर्मल सँत - वृक्ष हैं ।
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उन वृक्षों में निर्गुण ब्रह्म का नाम - फल प्राप्त होता है, जिसका चिन्तन रूप भक्षण करने से सन्तों का जीवन - प्राणाधार, मन इन्द्रियों का अविषय अपार प्रभु प्राप्त होता है ।
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उस वन के सँत - वृक्षों की शान्ति छाया शीतल है, उससे शरीर सुखी होता है । भगवत् - चरण सरोवर है, उसका ध्यान - जल प्राणी को निर्मल करता है ।
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इस वन के नाम, ज्ञान आदि सभी फल सुन्दर हैं और यह वन बारह मास सदा ही फल देता है । इस वन में इष्ट - पूर्ति, नीति, सदाचार, भक्ति, योग और ज्ञानादिक गर्वित नाना वाणी रूप ध्वनि प्रकट होती रहती है ।
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सत्संग वन में निवास करके अनेक साधक अमर हो गये हैं । अत: वहां ही चलना चाहिये । इस सत्संग - वन में ही विवेक - ज्ञान प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

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